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Sunday, November 15, 2009

सखी री , मैं कासे कहूं अपना दुखडा़



बेचारे इस पेड़ की हालत तो देखिए जो आप और हमारे द्वारा डाली गई गंदगी को अपने आंचल में समेटे अपनी बेवसी पर आंसू बहाने को मजबूर है । आखिर वह अपना दुखडा़ कहे तो किससे कहे । जी हां रोहिणी के सैक्टर तीन में मेन रोड पर खडा़ यह पीपल का पेड़ अपनी दुर्दषा की कहानी खुद ही बया कर रहा है । इस चित्र को देखकर आप भी पेड़ के दुख से अच्छी तरह वाकिफ हो जाएंगे ।
कॉमन्वेल्थ गेम्स की तैयारियों के चलते दिल्ली को प्रदूषण रहित व हर तरह से साफ - सुथरा बनाने की कवायद युद्धस्तर पर चल रही है । ऎसे में दिल्लीवासियों को विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से सीख दी जा रही है तथा उनसे सुधरने की अपील की जा रही है , लेकिन लगता है दिल्लीवासियों के कानों तक कोई आवाज नहीं पहुंच रही है या फिर वे हम नहीं सुधरेंगे की तर्ज पर चल रहे हैं । तभी तो वे खुले आम सड़क पर गंदगी फैलाने से बाज नही आ रहे हैं । समझ में नहीं आता कि धर्म के नाम पर गंदगी फैलाना कौन से ग्रंथ में लिखा है ? ये कैसी आस्था और भक्ति है कि पूजा - पाठ के बाद प्रयुक्त की गई पूजा सामग्री को घर से निकाल कर इस तरह बाहर खुलेआम फेंक दो ?
चित्र में साफ - साफ पता चल रहा है कि लोगों ने धार्मिक कलैण्डर , फूलमालाएं , दीए , हवन सामग्री , करवे म टूटी तस्वीरें आदि यहां पेड़ के नीचे खुले में फेंक कर अपनी धार्मिक आस्था की इतिश्री कर ली है । अब वही सामग्री किसी के पैरों तले रौंदी जाए या आवारा जानवरों द्वारा उसमें मुंह मारकर उसे इधर - उधर फैलाया जाए या फिर किसी वाहन के नीचे आए , इससे उनका कोई सरोकार नहीं । कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा कि वे जिस शिद्दत के साथ पूजा सामग्री को घर से बाहर निकाल आए हैं उसकी क्या दुर्दशा हो रही है ?
हालांकि हमारे शास्त्रों में वर्णित है कि पूजा सामग्री तथा देवी - देवताओं के चित्र , तस्वीर प्रतिमाएं ,आदि इधर - उधर न फेंकी जाएं इससे हमारे उन देवी - देवताओं का अपमान होता है । मगर आज हम स्वयं अपनी करतूतों से देवी - देवताओं का अपमान करने से नहीं चूक रहे हैं । पूजा में प्रयुक्त सामग्री व अन्य सामान को कभी नदी , तालाबों व गंगा मे बहाकर उन्हें प्रदूषित कर रहे हैं तो कभी पेड़ के नीचे डालकर वातावरण को गंदा कर रहे हैं । जबकि सही मायने में हमें चाहिए कि हम ऐसी सामग्री को किसी पार्क में या अपने घर के पिछवाडे़ में गड्डस खोदकर उसमें दबा दें । इससे ना तो हमारी धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचेगी , ना ही नदियां , तालाब व गंगा आदि का पानी प्रभावित होगा और ना ही ये सामग्री किसी पैरों तले रौंदी जाएगी ।
वही सरकारी तंत्र को भी चाहिए कि वह ऐसे लोगों के खिलाफ उचित कार्यवाई करे । पिछले दिनों ऐसी सुगबुगाहट हुई थी कि सरकार सड़क पर गंदगी फैलाने वालों के साथ सख्ती से पेश आएगी और उनसे जुर्माना भी वसूलेगी । लेकिन यही हमारे देश की खासियत हैं कि यहां कानून तोबनते हैं लेकिन देखने व सुनने के लिए ,सख्ती से पालन करने के लिए नहीं ।

3 comments:

Rakesh said...

। मगर आज हम स्वयं अपनी करतूतों से देवी - देवताओं का अपमान करने से नहीं चूक रहे हैं । पूजा में प्रयुक्त सामग्री व अन्य सामान को कभी नदी , तालाबों व गंगा मे बहाकर उन्हें प्रदूषित कर रहे हैं तो कभी पेड़ के नीचे डालकर वातावरण को गंदा कर रहे हैं । जबकि सही मायने में हमें चाहिए कि हम ऐसी सामग्री को किसी पार्क में या अपने घर के पिछवाडे़ में गड्डस खोदकर उसमें दबा दें । इससे ना तो हमारी धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचेगी , ना ही नदियां , तालाब व गंगा आदि का पानी प्रभावित होगा और ना ही ये सामग्री किसी पैरों तले रौंदी जाएगी ।
shashi ji ...bahut acha laga aapne us vishay per likha jo hum roj kerte hai aur kabhi hamara khyal us ore gaya nahi...wah...dhanyawad

HARI SHARMA said...

इसके लिये तो सच म्के एक आन्दोलन की जरूरत है

Shekhar kumawat said...

had ho gai yar ye to