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Thursday, August 20, 2009

सरनेम तेरी महिमा अपरंपार

आज मैं चोखेरबाली ब्लॉग पर गई और प्रतिभाजी द्वारा उठाए गए मुद्दे ’सरनेम की महिमा’ पढा ,वाकई प्रतिभाजी ने यह बहुत ज्वलंत मुद्दा उठाया है।इसे पढकर मुझे भी एक वाकया याद आ गया , मैं शादी से पहले अखबार के दफ्तर में काम कर चुकी हूं तब मैं सरनेम सिंघल की जगह अग्रवाल लगाती थी । खैर शादी के बाद मेरे कुछ सहकर्मियों को इस बात की जानकारी नहीं थी सो एक्बार मेरे एक सह्कर्मी का फोन आया तो मेरे पति ने ही फोन रिसीव किया , मेरे I सहकर्मी ने मुझे मेरे पहले के सरनेम से याद किया उस वक्त तो मेरे पतिदेव ने मुझे फोन का रिसीवर दे दिया लेकिन बाद में सरनेम को लेकर मेरी काफी खिंचाई की । उस समय मैंने इस बाद को तूल देने की बजाए वहीं खत्म किया लेकिन मुझे इस बात का एहसास भी हो गया कि पुरुष वर्ग कितनी भी खुली मानसिकता वाला बने लेकिन एसा होता नहीं है ।
इस समाज में पुरुष वर्ग स्वयं को भले ही कितना खुले विचारों का कह ले , मगर आज भी वह पुरानी सदी के दकियानूसी विचारों की गिरफ्त से बाहर नहीं निकल पाया है । हां , वह खुले दिमाग का है जरूर किंतु बाहरी दुनिया के लिए । जब अपने घर की बात आती है तो उसे साडी में लिपटी और पति की हर बात को सर झुका कर मानने वाली अनपढ नहीं किंतु अनपढ सरीखी बीबी की दरकार होती है । जबकि घर से बाहर वह एड्वांस लडकी में अपनी बीबी को तलाशता है या कहिए कि उसे वही लडकी सबसे अच्छी लगती है । आज के पुरुष दोहरी चाल चलते नजर आते हैं , एक ओर तो उन्हें कमाऊ बीबी की तलाश रहती है , वहीं दूसरी ओर वे बीबी का किसी भी पर पुरुष से बोलना - हंसना जरा भी पसंद नहीं करते । अब चूंकि बात उठी है पत्नी द्वारा शादी के बाद सरनेम न बदलने पर परिवार के टूटने की , मतलब या तो पत्नी सरनेम बदले अन्यथा पतिदेव नाराज होकर तलाक दे देंगे । यानि पतिदेव को इसमे अप्ना अहं और अपना अस्तित्व नजर आता है उसकी नजरो में पत्नी की कोई अहमियत नहीं ।मैं पूछती हूं कि आखिर पतियों को यह हक किसने दिया है ? क्या किसी मैरिज एक्ट में ेसा लिखा गया है ? जबकि मेरि समझ से शादी के बंधन मे बंधते समय पति - पत्नी दोनोसे एक - दूसरे का ख्याल रखने सबंधी सात वचन लिए जाते हैं नाकि पति दवारा पत्नी पर अपनी मनमानियां थोपने के । दरअसल सदियों से पुरुष्वादी मानसिकता ही अपना एकछत्र राज करती आई है जिसने कदम - कदम पर स्त्रियों को नीचा दिखाने तथा अपने प्रभुत्व मे जकड कर रखा है । आज भले ही समय ने करवट ले ली है और स्त्रियों ने सदियों से चली आ रही पुरुषवादी मानसिकता पर काफी हदतक अंकुश लगाया है लेकिन फिर भी आए दिन पुरुषों की ओछी मानसिकता के दर्शन होते ही रहते हैं । मैं कहती हूं कि यदि पत्नी को शादी के बाद सरनेम बदलने से कुछ प्फर्क न पडता हो तो सरनेम बदलने में कोई हर्ज नही । लेकिन हां , कईबार नौकरीपेशा पत्नी को सरनेम बदलना बहुत मुश्किल हो जाता है उसे तमाम कागजाती कार्यवाहियों से दो - चार होना पडता है एसी परिस्तिथियों में पति को पत्नी का साथ देना चाहिए ना कि सरनेम को अपनी मूंछ का सवाल बनाए । यदि जो पति अपनी पत्नी की इस पीडा को न समझे और अपनी बात पर डटा रहे तो ऎसे पति को सबक सिखाना भी बहुत जरूरी है । अतः अमुक बहन अपनी आवश्यकता को जांचे और उचित कदम उठाने से न घबराएं ।

4 comments:

अर्शिया said...

Sahi kahaa aapne.
( Treasurer-S. T. )

Ram said...

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सुजाता said...

शशि जी ,
आपकी प्रतिक्रिया ,चोखेरबाली पर अन्य टिप्पणियाँ व प्रतिभा जी का लेख पढने के बाद यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि उपनाम , सरनाम आदि किसी व्यक्ति पर जबरन नही थोपे जाने चाहिए।यह उस स्त्री की इच्छा और निर्णय है कि वह अपना सरनेम क्या रखे , पति को उसे अपनी पहचान को बदलने के लिए बाध्य करना अनुचित है।

साथ ही मै ध्यान दिलाना चाहूंगी कि पति का सरनेम यदि पितृसत्ता की गुलामी का प्रतीक है तो विवाह पूर्व का सरनेम भी उसई पितृसत्ता का प्रतीक है।वह भी "पिता" का ही सरनेम है, माता का नही।इसलिए स्त्री के लिए सरनेम मात्र की ही समस्या पितृसता की अधीनता से जुड़ी है।

पिता के सरनाम को महत्व देने का एक ही कारण हो सकता है कि बड़े होने तक आपकी पह्चान के साथ वह नाम जुड़ चुका होता है जिसे शादी के साथ बदलना , पह्चान के बदल देने जैसा है।

अन्यथा पितृसत्ता का तर्क तो विवाह् पूर्व के सरनेम पर ज्यों का त्यों लागू होता है।

दिव्य नर्मदा said...

नाम और उपनाम आप खुद कहाँ चुनते हैं? ये दोनों ही थोपे गए होते हैं. आपके हाथ में सिर्फ यह है की इन्हें गुमनाम न रहने दें.