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Thursday, August 21, 2008

’नो पेन नो गेन, नो गट्स नो ग्लोरी’

लगता है हमारे युवा मुक्केबाजों के हौंसले बुलंद करने में "नो पेन नो गेन , नो गट्स नो ग्लोरी" का नारा अपना कमाल दिखा गया । ओलंपिक में जीतकर पदक लाने की बात तो बाद की है लेकिन यहां तक पहुंचना भी बडा़ कठिन होता है । यह जानकर हैरानी हुई कि ओलंपिक में भारत का मान बढा़ने वाले ये विजयी खिलाडी़ किसी बडे़ शहर या खेल संस्थान से ताल्लुक नहीं रखते हैं ब्ल्कि ये तो छोटे-छोटे गांवॊं व कस्बों से आए हुए हैं । हरियाणा राज्य के जिला भिवानी के सेक्टर - १३ के सुदूर कोने पर स्थित गांव में बना है एक बॉक्सिंग क्लब । हैरानी की बात है कि इस छोटे से क्लब ने एक नहीं चार ओलंपियन पैदा किए हैं -जितेंद्र , बिजेन्द्र , अखिल व दिनेश । यह बात अलग है कि इन चार में से बिजेन्द्र ही पदक पाने में कामयाब रहे ।
गौर करने लायक बात तो यह है कि यह क्लब दुनिया का सबसे छोटा कोचिंग सेन्टर है और यहां कोई फीस नहीं ली जाती । हरियाणा की चिलचिलाती गर्मियों में न यहां पीने का पानी होता है और न ही यहां हवा के लिए कोई पंखा । क्लब में एक बॉक्सिंग रिंग , पॉंचपंचिंग बैगों और कुछ वेट ट्रेनिंग के औजार के अलावा कुछ नहीं है। खिलाडि़योम का हौंसला बुलंद करने के नाम पर यदि यहां कुछ है तो वो है क्लब की दीवारों पर बडे़-बडे़ अक्षरों में लिखा यह नारा कि ”नो पेन नो गेन , नो गट्स नो ग्लोरी” । नाज हमें अपने ऎसे रणबांकुरों पर जो तमाम असुविधाओं को ध्ता बताते हुए अपनी मंजिल तक पहुंच जाते हैं और अपने साथ-साथ अपने गांव ही नहीं दुनियाभर में भारत का नाम रोशन करते हैं ।धन्य है ऎसे गांव और गांव के रणबांकुरे !

2 comments:

Udan Tashtari said...

धन्य है!!!

Anil said...

सैकडों युवकों को मुक्केबाजी का प्रशिक्षण देने वाले इस सेण्टर में सिर्फ़ तीन पंचबैग हैं. इससे ही आप अंदाजा लगा सकते हैं की कितनी दरिद्रता की हालत में ये लोग ओलंपिक पहुंचे हैं. हालाँकि इनपर रुपयों की बरसात तो होती नहीं दिख रही, लेकिन सुना है कुछ अमीर लोग शायद आगे आएंगे इन्हें सुविधाएं देने में.