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Tuesday, July 15, 2008

औरत ही औरत की दुश्मन ?

अभी मैं अन्नू का ब्लॉग पढ़ रही थी , अन्नू की लिखी 'औरत के हक़ में ' पोस्ट पढ़ी , अच्छा लगा यहाँ मुझे भी कुछ कहने की उत्सुकता हुई सबसे पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगी कि अगर आज कोई महिला घर से बाहर कदम निकालती हैया परिवार में रहते हुए अपने हक़ व् अधिकारों कि बात कराती है तो सबसे पहले उसे अपने घर के सदस्यों का सामना करना पढता है जिनमें न सिर्फ मर्द जात होती है बल्कि उनमें औरत जात भी शामिल होती है कहने का मतलब है कि समाज तो बाद की बात है पहले तो उसे अपने घर परिवार में मौजूद सास , ननद ,या माँ - बहन के कुटिल सवालों का डटकर मुकाबला करना पढता है इनसे निपटने के बाद आती है बारी समाज में बैठे अन्य पहरेदारों की सच मानिए तो प्राचीन समय में समाज के ठेकेदारों ने व्यवस्था ही कुछ ऐसी बना डाली कि एक औरत को समाज का सबसे कमजोर प्राणी मानकर उसे शुरू से ही अपने तथा पैरों तले दबाकर तथा पैरों की जूती मानकर घर कि चारदीवारी में कैद करके रखा शुरू से ही ऐसी परम्परा चली आई कि औरत को मात्र घर को सँभालने वाली व उपभोग कि वास्तु माना गया शायद यही वजह रही कि दबाव में रहते - रहते औरत स्वयम औरत जात कि ही दुश्मन बन बैठी अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों व जुल्म कुंठा को वह अपनी बेटी या बहु पर निकालती आ रही है और अब जबकि ज़माना बिल्कुल बदल गया है तो आज भी यह बदली तस्वीर पुरानी पीढी को नही भा रही है बदलते युग में महिलाओं कि स्थिति भी काफी बदली है , आज शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहाँ महिलाओं की भागीदारी न हो । आज महिला पहले की तरह अबला नहीं रही , आज की सबला महिला अपने हक व अधिकारों के लिए लड़ना बखूबी जानती है । लेकिन ऐसा नहीं कि महिलाओं ने इस बदलाव की मंजिल को आसानी से पार कर लिया हो ? खैर वह मंजिल ही क्या जिसे आसानी से पा लिया जाय ।
अंतत: आज जमाना बराबरी का है यानी जो सुविधाएं व हक एक बेटे का है वही हक व सुविधाओं की दरकार एक बेटी को भी है । आज बेटा - बेटी के पालन - पोषण में किसी भी तरह का भेदभाव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा । और इस काम को करने के लिये एक महिला को ही हिम्मत से काम लेना होगा ।

2 comments:

masijeevi said...

जारी रहें।।

पोस्‍ट के फांट आकार को बढ़ाने पर विचार करें। इस आकार में पढ़ना तकलीफदेह है।

ab inconvenienti said...

जो समाज जितना प्रगतिशील, खुले और विकसित विचारों वाला होगा वह उतना ही स्त्रियों के प्रति उदार विचार रखेगा. यह दोष पिछडेपन का है, शहरों में भी लड़कियों के लिए बंधन हैं, पर पढने से झोपड़पट्टी में रहने वाला परिवार भी अपनी लड़कियों को (प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से) नहीं रोकता.

अगर बात सिर्फ़ पुरुषों के अहम् की होती तो काफी आसान थी, पर यहाँ खलनायक पिछडी मानसिकता है. कोई पढ़ा लिखा पिता अपनी बेटी की पढ़ाई में तो कम से कम बाधा नहीं डालता है. दहेज़ जैसी कुप्रथाएं मुंबई बंगलूर जैसे महानगरों से विदा ले रहीं हैं. और वहां की अधिकतर जनसँख्या शिक्षित है.

आप इन सब बातों पर सिर्फ़ खेद जता कर या स्तब्ध रहकर समाज के पिछडेपन को दूर नहीं कर सकते. और कुछ बने न बने पर एक बात ज़रूर कारगर हो सकती है, सरकार के जितने भी फंड शिक्षा के लिए आता है अगर वह ईमानदारी से उसी में पूरा लगाया जाए तो इस तरह लड़कियों की पढ़ाई छूटते देख दुखी नहीं होना पड़ेगा. क्योंकि तब समाज पिछडेपन से भी उबरने लगेगा.