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Friday, February 26, 2010
..........तब मेरी खुशी का ठिकाना न रहा
मैंने समझाने के तौर पर कहा कि आज बच्चे ही तो बडों को गलत आदतों से रोकते हैं । अच्छे काम करने का बीडा़ भी बच्चे असानी से उठा लेते हैं फिर तुम क्यों पीछे रहो तुम भी अपनी गंदी आदतों को बदल डालो । और देखो मेरे बेटे ने भी जिद की थी लेकिन मेरे समझाने व नुकसान गिनाने पर वह किसी भी तरह के रंग नही लेकर आया है । मेरे यह सब कहने पर मेरी सहेली बोली कि मैं भी इसे मना कर रही थी कि ये रंग न ले मगर ये माना ही नहीं ।तभी उसका बेटा [वरुण ] बोला आंटी अब आगे से नहीं लाऊंगा और तुरंत अपनी मम्मी से मुखातिब होकर बोला मम्मी चलो ये कलर हम दुकानदार को वापस कर आते हैं । मेरी सहेली ने भी बिना देर किएउसे दुकान पर ले गई और वे कलर वापस कर आई ।
वरुण अभी दस साल का बच्चा है लेकिन देखो उसने मेरी बात को समझा और उस पर अमल भी किया जो कि अन्य बच्चों के लिए तो प्रेरणादायक है ही साथ ही बडों की लिए भी सीख है ।
मुझे वरुण के इस कदम से काफी खुशी मिली । मैंने उसे शाबाशी दी तथा उससे कहा कि बेटे आज तुम जैसे छोटे - छोटे बच्चे ही इतने बडे़ - बडे़ कदम उठाकर बडों को काफी हद तक बदल सकते हो । सचमुच यह सब होता देखकर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा और मैं आप सबके साथ अपनी खुशी को बांटकर एक छोटे से बच्चे के साहसी कदम को आपके बीच ले आई हूं इन्हीं उम्मीदों के साथ कि आप लोग अपनी टिप्पणी रूपी शाबाशी देकर वरुन के साथ और बच्चों की भी होंसलाआफजाई करें । दरअसल में समझ ही नहीं पा रही थी कि मैं रिवार्ड में उसे क्या दूं । फिर सोचा कि आपकी टिप्पणी रूपी रिवार्ड ही सबसे रहेगा ।
Monday, January 11, 2010
'तबला वादन के क्षेत्र में एक लोकप्रिय नाम सोवन हजरा''

पारम्परिक संगीत के घराने में जन्में सोवन ने सात वर्ष की छोटी सी आयु में स्टेज पर कार्यक्रम पेश करना आरम्भ कर दिया था.ऐसे ही संगीत के एक कार्यक्रम में उन्होंने लगातार १५ मिनट तक तबला बजाया और सभी की वाह वाही हासिल की.
बनारस घराने के पंडित विश्वनाथ बोस, पंडित जयंत बोस व पंडित कुमार बोस के शिष्य सोवन हजरा ने भारतीय कलाकेन्द्र के पंडित मालवीय से भी संगीत सीखा और इन सभी गुरुओ की शिक्षाओ का भरपूर उपयोग कर संगीत जगत की ऊचाइयों को छूया. उन्होंने संगीत जगत की अनेको महान हस्तियों के साथ स्टेज पर परफ़ॉर्म किया है. जिनमें मशहूर गायिका परवीन सुल्ताना, सितार वादक पंडित रवि शंकर, पंडित देबू चौधरी आदि तो हैं ही, इनके अलावा सोवन नृत्यांगना पदमश्री सरोज बैधनाथन, यामिनी कृष्णमूर्ति आदि के साथ हमेशा ही कार्यक्रम पेश करते हैं.
सोवन ने सन २००३ में ''स्काय'' नाम से अपना एक म्यूजिकल ग्रुप भी बनाया. उनके इस पहले फ्यूजन शास्त्रीय बैंड ने पूरे देश में परफ़ॉर्म किया व सफलता भी प्राप्त की.
पिछले दिनों राजधानी दिल्ली में प्रसिद्ध लेखक व उपन्यासकार मुल्क राज आनंद का १०५ वां जन्म दिवस समारोह मनाया गया. इस अवसर पर आयोजित शास्त्रीय संगीत संध्या में सोवन हजरा ने शानदार प्रस्तुतियां पेश की. इनके साथ सारंगी पर संगत की सारंगी वादक सुहैल युसूफ ने. इससे पहले भी उन्होंने मुल्कराज आनंद के जन्म दिवस समारोह में सूफी गायक हंस राज हंस के साथ भी ऐसी शानदार जुगल बंदी पेश की जिसे आज तक श्रोता नहीं भूले हैं.
Tuesday, December 15, 2009
सामाजिक संदेश लेकर आएगी असीमा : ग्रेसी सिंह
अभिनेत्री ग्रेसी सिंह ने बड़े परदे पर अपना अभिनय सफर आरम्भ किया फ़िल्म ''लगान'' से. निर्देशक आशुतोष गावरिकर की इस फ़िल्म में उनके हीरो थे आमिर खान, इस फ़िल्म ने अपार सफलता हासिल की, इस फ़िल्म के बाद ग्रेसी की अगली फ़िल्म आयी “मुन्ना भाई एम बी बी एस”, इस फ़िल्म ने भी सफलता के कई कीर्तिमान स्थापित किये. फिर आयी ''गंगाजल'' और फिर ''अरमान''. इन सभी फिल्मों की सफलता से ग्रेसी को लोगो ने लकी हिरोइन मान लिया. इन फिल्मों के बाद वजह, मुस्कान, शर्त - द चैलेंज आदि उनकी कई फ़िल्में आयीं लेकिन इन फिल्मों को वो सफलता नहीं मिली जो कि मिलनी चाहिए थी. फिर उनकी फ़िल्म आयी ''देश द्रोही'' इस फ़िल्म को भी जबर्दस्त चर्चा मिली. इस समय ग्रेसी चर्चित हैं अपनी आने वाली फ़िल्म ''असीमा'' के लिए. पिछले दिनों उनसे बातचीत हुई उनकी इसी आने वाली फ़िल्म के लिए. प्रस्तुत हैं कुछ अंश -
क्या फ़िल्म ''असीमा' किसी उपन्यास पर आधारित है?
हाँ यह फ़िल्म पुरस्कार प्राप्त उड़िया उपन्यास ''असीमा'' पर आधारित है. इस उपन्यास को लिखा है उड़िया कवि और उपन्यासकार शैलजा कुमारी अपराजिता मोहंती ने.निर्देशक शिशिर मिश्रा की इस फ़िल्म ''असीमा'' के निर्माता हैं कबिन्द्र प्रसाद मोहंती. फ़िल्म के गीत लिखे हैं मनोज दर्पण, शब्बीर अहमद व सत्यकाम मोहंती ने और गीतों की धुनें बनायीं हैं संगीतकार समीर टंडन ने. उड़ीसा की ८० और ९० के दशक की दिल को छू लेने वाली कहानी है ''असीमा'' की.
फ़िल्म ''असीमा'' के बारें में बताइए क्या कहानी है और आपकी क्या भूमिका है?
यह फ़िल्म एक असीमा नामक महिला के जीवन पर आधारित है जो प्यार व रिश्तों को नये सिरे से परिभाषित करती है, यह महिला किस तरह से अकेले ही अपने लक्ष्य को प्राप्त करती है इसके जीवन में बहुत सारे दुख व तकलीफ हैं कैसे वो इनसे छुटकारा पाती है. मैं असीमा की मुख्य भूमिका में हूँ. ''के जे ड्रींम वेंचर्स'' की इस फ़िल्म के निर्देशक हैं शिशिर मिश्रा.
क्या यह फ़िल्म दर्शकों को पसंद आएगी?
बिल्कुल क्योंकि फ़िल्म की कहानी बहुत ही अच्छी है, इसमें दर्शको को एक प्यारी सी प्रेम कहानी तो देखने को मिलेगी ही इसके अलावा एक महिला के दुःख, दर्द की कहानी भी है फ़िल्म में.
ऐसा तो नहीं कि यह फ़िल्म पूरी तरह से गंभीर हो और दर्शको को इसमें मनोरंजन न मिले?
ऐसा बिल्कुल भी नहीं हैं, दर्शको को मनोरंजन तो पूरा मिलेगा ही, इसके साथ ही उन्हें सामाजिक संदेश भी मिलेगा.
आपने यह फ़िल्म क्यों साइन की?
क्योंकि मुझे इसकी कहानी बहुत ही अच्छी लगी. इसके अलावा मुझे असीमा के किरदार को निभाने वक्त एक साथ एक स्त्री के जीवन के तीन अलग अलग पहलूओं को निभाने का मौका मिला. साथ में मुझे यह भूमिका बहुत ही चुनौतीपूर्ण लगी.
निर्देशक शिशिर मिश्रा के साथ काम करना कैसा रहा?
बहुत ही अच्छा, उन्होंने ऐसी फ़िल्म बनायीं है जो कि हर किसी के दिल को छूएगी. मैं ऐसा इसलिए नहीं कह रहीं हूँ कि मैंने इसमें काम किया है जब आप इस फ़िल्म को देखेगें तब आप महसूस करेंगें. शिशिर ने पहले भी शाबाना आजमी जी [समय की धार] के साथ व स्मिता पाटिल जी [भीगी पलकें] के साथ फिल्मे बनायी हैं.
Monday, November 30, 2009
Sunday, November 22, 2009
प्रकृति की रक्षा में सामाजिक जागरूकता का अहम योगदान है

जलवायु परिवर्तन विषय पर दिसम्बर २००९, कोपेनहेगन में हो रहे शिखर सम्मेलन में, भारतीय धार्मिक नेताओं को भी शामिल किया जा रहा है.जिसमें शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती,( कांची पीठ) और हजरत मौलाना उमेर अहमद इलयासी, ( अध्यक्ष अखिल भारतीय इमाम संगठन) संयुक्त रूप से शामिल हो रहें हैं.
इन दोनों ही नेताओ का मानना है प्रकृति की रक्षा के लिए, केवल आर्थिक प्रोत्साहन, हस्तक्षेप, विपरीत शिक्षा ही पर्याप्त नहीं है. ये सभी कदम महत्वपूर्ण हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं हैं. प्रकृति को तभी बचाया जा सकता है जबकि समाज इसके प्रति पूर्ण रूप से जागरूक हो.
ऐसा पहली बार हुआ है जब वास्तव में दो सबसे महत्वपूर्ण भारतीय धार्मिक नेताओं द्वारा ग्लोबल वार्मिंग जैसे विषय पर कदम उठाए जा रहें हैं. शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती और मौलाना उमेर अहमद इलयासी ऐसे प्रतिभाशाली नेता हैं जो सामाजिक परिवर्तन के बारें में जागरूकता पैदा कर सकते हैं यह समाज जो कि लालच, हिंसा, भौतिकवाद आदि से भरा है. विभिन्न वैज्ञानिकों द्वारा उठाए गए सभी तकनीकी कदम बेकार हैं. जब तक समाज में ही परिवर्तन न हो पा रहे हो. इसलिए यह आवश्यक है कि इस तरह धार्मिक नेताओं द्वारा जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर मुद्दे पर समाधान किया जाए और समाज को जागरूक किया जाए.
Tuesday, November 17, 2009
भगवान को याद किया , पूजा अर्चना की , कूडा़ फैलाया और खिसक लिए

Sunday, November 15, 2009
सखी री , मैं कासे कहूं अपना दुखडा़
बेचारे इस पेड़ की हालत तो देखिए जो आप और हमारे द्वारा डाली गई गंदगी को अपने आंचल में समेटे अपनी बेवसी पर आंसू बहाने को मजबूर है । आखिर वह अपना दुखडा़ कहे तो किससे कहे । जी हां रोहिणी के सैक्टर तीन में मेन रोड पर खडा़ यह पीपल का पेड़ अपनी दुर्दषा की कहानी खुद ही बया कर रहा है । इस चित्र को देखकर आप भी पेड़ के दुख से अच्छी तरह वाकिफ हो जाएंगे ।
कॉमन्वेल्थ गेम्स की तैयारियों के चलते दिल्ली को प्रदूषण रहित व हर तरह से साफ - सुथरा बनाने की कवायद युद्धस्तर पर चल रही है । ऎसे में दिल्लीवासियों को विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से सीख दी जा रही है तथा उनसे सुधरने की अपील की जा रही है , लेकिन लगता है दिल्लीवासियों के कानों तक कोई आवाज नहीं पहुंच रही है या फिर वे हम नहीं सुधरेंगे की तर्ज पर चल रहे हैं । तभी तो वे खुले आम सड़क पर गंदगी फैलाने से बाज नही आ रहे हैं । समझ में नहीं आता कि धर्म के नाम पर गंदगी फैलाना कौन से ग्रंथ में लिखा है ? ये कैसी आस्था और भक्ति है कि पूजा - पाठ के बाद प्रयुक्त की गई पूजा सामग्री को घर से निकाल कर इस तरह बाहर खुलेआम फेंक दो ?
चित्र में साफ - साफ पता चल रहा है कि लोगों ने धार्मिक कलैण्डर , फूलमालाएं , दीए , हवन सामग्री , करवे म टूटी तस्वीरें आदि यहां पेड़ के नीचे खुले में फेंक कर अपनी धार्मिक आस्था की इतिश्री कर ली है । अब वही सामग्री किसी के पैरों तले रौंदी जाए या आवारा जानवरों द्वारा उसमें मुंह मारकर उसे इधर - उधर फैलाया जाए या फिर किसी वाहन के नीचे आए , इससे उनका कोई सरोकार नहीं । कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा कि वे जिस शिद्दत के साथ पूजा सामग्री को घर से बाहर निकाल आए हैं उसकी क्या दुर्दशा हो रही है ?
हालांकि हमारे शास्त्रों में वर्णित है कि पूजा सामग्री तथा देवी - देवताओं के चित्र , तस्वीर प्रतिमाएं ,आदि इधर - उधर न फेंकी जाएं इससे हमारे उन देवी - देवताओं का अपमान होता है । मगर आज हम स्वयं अपनी करतूतों से देवी - देवताओं का अपमान करने से नहीं चूक रहे हैं । पूजा में प्रयुक्त सामग्री व अन्य सामान को कभी नदी , तालाबों व गंगा मे बहाकर उन्हें प्रदूषित कर रहे हैं तो कभी पेड़ के नीचे डालकर वातावरण को गंदा कर रहे हैं । जबकि सही मायने में हमें चाहिए कि हम ऐसी सामग्री को किसी पार्क में या अपने घर के पिछवाडे़ में गड्डस खोदकर उसमें दबा दें । इससे ना तो हमारी धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचेगी , ना ही नदियां , तालाब व गंगा आदि का पानी प्रभावित होगा और ना ही ये सामग्री किसी पैरों तले रौंदी जाएगी ।
वही सरकारी तंत्र को भी चाहिए कि वह ऐसे लोगों के खिलाफ उचित कार्यवाई करे । पिछले दिनों ऐसी सुगबुगाहट हुई थी कि सरकार सड़क पर गंदगी फैलाने वालों के साथ सख्ती से पेश आएगी और उनसे जुर्माना भी वसूलेगी । लेकिन यही हमारे देश की खासियत हैं कि यहां कानून तोबनते हैं लेकिन देखने व सुनने के लिए ,सख्ती से पालन करने के लिए नहीं ।
Thursday, November 5, 2009
”मारेगा साला”

संगीत – सारेगामा सी डी मूल्य -- १५० रूपए''मरेगा साला'' यह नाम है उस फ़िल्म का, जिसका संगीत पिछले दिनों रिलीज़ किया है संगीत कंपनी सारेगामा ने. इस फ़िल्म की निर्मात्री हैं हेमा हांडा व निर्देशक हैं देवांग ढोलकिया. प्रवीण भारद्वाज के लिखे गीतों की धुनें बनाई हैं संगीतकार हैं डब्बू मलिक ने.पहला गीत है '' सेहरा सेहरा'' सुनिधि चौहान की आवाज में है यह गीत, एक बार तो मूल रूप में हैं जबकि दूसरी बार रिमिक्स रूप में है. अच्छा है सुनने में. ''परदे वाली बात'' गीत को अपने ही अंदाज में गाया है अलीशा चिनाय ने. लोकप्रिय होगा यह गीत श्रोताओ में, यह गीत भी दो बार है एक बार मूल रूप में जबकि दूसरी बार रिमिक्स रूप में है. ''तू ही तू है'' यह गीत तीन बार है एक बार रिमिक्स है और दो बार अलग - अलग सुनिधि व संगीतकार डब्बू मलिक ने इसे गाया है. प्यार मोहब्बत में डूबा यह गीत भी अच्छा है.''आँखे तुम्हारी सब कह रहीं हैं'' इस फ़िल्म का सबसे अच्छा गीत है, इस रोमांटिक गीत को सोनू निगम व श्रेया घोषाल ने बहुत ही खूबसूरती से इसे गाया है. यह गीत सीधे सुनने वालो के दिलो पर दस्तक देगा.सारेगामा द्वारा रिलीज़ किये फ़िल्म ''मरेगा साला'' का संगीत श्रोताओ को पसंद आयेगा क्योंकि अधिकतर सभी गीत प्रेम से जुड़े हुयें हैं और गीत -संगीत का सामंजस्य भी अच्छा है.
Wednesday, November 4, 2009
ओबामा पतले हुए
खबर आई है कि अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा आजकल काम के बोझ तले इतने दब गए हैं कि उसका असर उनकी सेहत बयां रही है यानि ओबामा का वजन कम हो गया है और वह पहले से दुबले दिखने लगे हैं । एक अमेरिकन बेवसाइट ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया है । बेवसाइट की रिपोर्ट के मुताबिक पहले अश्वेत राष्ट्रपति होने के नाते ओबामा के कंधों पर देश की जिम्मेदारी कुछ ज्यादा पड़ गई है , जिसके चलते वह ठीक से खाना खाने का ध्यान नहीं रखते है । खैर एक तो देश की जिम्मेदारी ऊपर से उन्हें पिछले दिनों नोबेल शांति पुरस्कार से जो नवाजा गया उसकी जिम्मेदारी निभाना भी कोई कम बात नहीं है । इधर इतनी जल्दी मिले नोबेल शांति पुरस्कार और एक कार्यक्रम के दौरान ओबामा द्वारा मसली गई मक्खी को लेकर उअनकी कम छीछालेदन नहीं हुई । अब इसके चलते देखा जाए तो नोबेल पुरस्कार की इज्जत बनाए रख्ना कोई कम नहीं है । शायद देश की जिम्मेदारी से नहीं बल्कि नोबेल पुरस्कार को लेकर ओबामा कुछ ज्यादा दबाव में आ गए हैं , जिसका असर उनकी सेहत पर पड़ रहा है ।
कोई बात नहीं ओबामा जी , सेहत तो फिर बन जाएगी लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि फिर कोई मक्खी या मच्छर आपके हाथों से मसला न जाए और भविष्य में शांति से काम लेकर नोबेल पुरस्कार की गरिमा को बनाए रखा जाए ।
Monday, November 2, 2009
जमकर लुत्फ उठाया लोगों ने हरियाण्वी लोक शैली रागिनी और नृत्य का
इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में हरियाणा कीलोक संस्कृति की पहचान रागिनी व नृत्य प्रस्तुत किया हरियाणवी कलाकारों ने । रगिनी के प्रस्तुतिकरण का मुख्य उद्देश्य था कि एक तो लोग दिल्ली में बसने के बाद इस हरियाणवी लोक विधा से दूर हो गए थे । इसके अलावा आज की नई पीढी़ [जो रागिनी से कोसों दूर है ]को हरियाणवी लोक संस्कृति से रूबरू करा इससे जोड़ना । अशोक ’अद्भुत ’ व अनिल गोयल ने हरियाणवी भाषा में काव्यपाठ किया तो उपस्थित कुछ लोगों ने हरियाणा में भिवानी की विशेषताओं और खूबियों को गिनाया । कार्यक्रम का संचालन कर रहे कवि राजेश चेतन ने हरियाणा शब्द का मतलब बता लोगों को अविभूत कर दिया । कहते हैं कि महाभारत काल में जब कृष्णजी के चरण यहां पडे़ थे और जब वह जाने लगे तोलोगों ने उनसे यहां दोबारा आने का वादा लिया था , तभी से लोग उनके आने की प्रतीक्षा में है और हरि - आना , हरि - आना करते - करते यहां का नाम हरियाणा पड़ गया ।
उल्लेखनीय है कि कवि राजेश चेतन व उअनके तमाम सहयोगियों ने हरियाणा से दूर होने की कमी को महसूस किया और इसी कमी को दूर करने के प्रयास में उन्होंने भिवानी जिले के उन तमाम लोगों को एकत्रित कर एक मंच पर लाने की कोशिश की है । जिसके तहत एक संस्था का गठन किया गया है जिसमें उन्हीं प्रिवारों को जोडा़ जा रहा है जो भिवानी जिले से ताल्लुक रखते हैं । इस संस्था का फिलहाल कोई नामकरण नहीं हुआ है किंतु इससे अब तक सौ से ज्यादा लोग जुड़ चुके हैं । श्री चेतन के अनुसार संस्था क नाम शीघ्र ही सभी सदस्यों की सहमति से अगली बैठक मे रख लिया जाएगा । उन्होंने बताया कि अगले वर्ष होली तक ऐसे परिवारों की एक दिग्दर्शिका भी प्रकाशित की जाएगी ताकि आपको एक ही जगह पर अपने लोगों की जानकारी हो सके ।
बहरहाल चेतन जी का सभी परिवारों एक सूत्र में बांधने का प्रयास सराहनीय है ।
