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Friday, May 29, 2020



लघुकथा .........

                              बेवसी

                
                      --- डॉ शशि सिंघल --
  
     नैना आज बहुत गुस्से में थी । एक निवाला तो दूर एक घूँट पानी भी उसके गले से नीचे नहीं उतर रहा था । वजह  हर बार  की तरह माँ की वही बेवसी , लाचारी और मजबूरी भरी मनुहार । 
     बेटी नैना , “घर के हालात तुमसे छिपे नहीं है । तुम्हारे पापा का काम बंद है । तनाव के कारण उनकी तबियत भी ठीक नहीं रहती । कुछ कामधाम है नहीं , ऊपर से डॉक्टरों के यहाँ के चक्कर और दवाईयों में दुनियाभर का पैसा खर्च हो जाता है ।  घर में खाने के लाले पड़े हैं । उधर रिया की डॉक्टरी की पढ़ाई का खर्चा भी कोई कम नही है। कहाँ से लाऊँ , क्या करूँ ? अब तो बर्तन - भांडे भी नहीं रहे जिन्हें बेचकर घर का गुजारा हो सके ।" एक ही साँस में माँ इतना कुछ कह गयी ।

      नैना समझ गयी माँ की इस बदहवासी का कारण । जरूर रिया की चिट्ठी आई होगी और उसने की होगी पैसे की डिमांड । इतनी परेशान क्यों हो माँ  (सबकुछ जानते हुए भी )रिया ने पूछा ?
       वोsssवोsss रिया ..मैंने तुमसे वादा किया था कि इस बार बुनाई के आने वाले रुपयों में से तुम्हारी फीस के लिए दे दूँगी , लेकिन इस बार तुम्हारी फीस भरपाना संभव नहीं हो पा रहा है। वो मैं कह रही थी कि तुम अब से एक घंटा और ज्यादा बुनाई का काम कर लो तो सच कहती हूं ,उससे आने वाले पैसों से अवश्य ही तुम्हारी फीस भर दूँगी ।
      माँ के ये शब्द नैना को गहरे तक चुभ गये । ऐसा नहीं पहले नहीं चुभे लेकिन पहले माँ की मजबूरी मानकर चुप रह जाती और पहले से ज्यादा मेहनत करने लग जाती थी। खैर कोई प्रत्युत्तर दिए नैना वहाँ से चली गयी । 
     माँ पढ़ी - लिखी नहीं थी मगर वह अपने बच्चों को पढ़ा - लिखाकर कामयाब इंसान बनते देखना चाहती थी । यही वजह है कि तमाम मुश्किलों के बाद भी माँ ने अपनी बड़ी बिटिया रिया को मेडीकल की पढ़ाई करवाई । माँ ऐसा सोचती थी कि घर में बड़ा बच्चा पढ़ लिख जाएगा तो उसके पीछे - पीछे दूसरे बच्चे भी लायक बन जाएंगे । अपनी इसी सोच के चलते माँ ने अपना सारा ध्यान रिया पर केंद्रित कर दिया था । 

        घर में पैसे की तंगी से जूझने के लिए माँ स्वेटर बुनने की मशीन ले आई थी । नैना ने घर में रहकर काम करने में माँ का पूरा हाथ बंटाया । नैना मशीन से स्वेटर बनाती और माँ दुकानदार से माल व रुपयों का लेन - देन करती थी । 
      इधर धीरे - धीरे नैना ने पोस्ट ग्रेजुएशन कर लिया । अब उसे पीएचडी में रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए फीस जमा करवानी थी । इसके लिए उसने जब अपनी इच्छा माँ के सामने जाहिर की तब माँ ने ही तरकीब सुझाई थी कि अगर वह प्रतिदिन दस स्वेटर बनाती है तो उसकी जगह बारह स्वेटर बनाने शुरू कर दे । मतलब प्रतिदिन वह रोजाना से एक घंटा ज्यादा काम कर ले तो इससे आने वाले अतिरिक्त  रुपयों से उसकी फीस आसानी से जमा हो जाएगी । 
   परिस्थितिवश नैना ने माँ का सुझाव मान‌ लिया । पीएचडी करने की ललक में जी - तोड़ मेहनत करने लगी । मगर नतीजा वही “ढाक के तीन पात " रहा । 
     क्योंकि जब भी मेहनताना आता तभी माँ के सामने रिया का कोई ना कोई खर्चा खड़ा हो जाता । इसका हर्जाना भुगतना पड़ता नैना को जिसके लिए उसकी फीस अगले टाइम के लिए टाल दी जाती । ये सिलसिला पिछले तीन माह से चल रहा था ।
     जो नहीं होना चाहिए था एक बार फिर वही हुआ । आज भी माँ अपनी मजबूरी का रोना लेकर बैठ गयी । 
   लेकिन आज नैना कुछ भी सुनने - समझने को तैयार ना थी । उसे रह रह कर एक ही बात परेशान कर रही थी कि माँ को रिया ही रिया दिखती है मैं क्यों नहीं ? आखिर ऐसा क्या है रिया में ? मैं भी तो उन्हीं की बेटी हूँ फिर मुझसे प्यार क्यूँ नहीं ? आखिर माँ मेरे जज्बात क्यूँ नहीं समझती ? 
  वक्त , हालात और मजबूरी के आगे बेवस नैना माँ का विरोध तो नहीं कर पाई । बस गुस्से से आग बबूला हो पैर पटकती हुई अपने कमरे में चली गयी । अब आगे वह क्या करे क्या ना करे यही सब सोचती रही और घंटों अपनी बेवसी पर आँसू बहाती रही 



डॉ. शशि सिंघल 
C 5 /256 , सैक्टर --6
रोहिणी , 
नयी दिल्ली - 110085 
मोबाइल नं. -- 9899665007
ई मेल -- drshashisinghal@ yahoo.com

Tuesday, August 8, 2017

आत्मविश्वास बढ़ाए काउंसलिंगशशि सिंघ

शशि सिंघल
आज सुनिधि काफी तनावमुक्त लग रही थी। उसने बताया कि स्कूल में नियुक्त एजूकेशनल काउंसलर की मदद से उसके बेटे अमन का उग्र होता व्यवहार अब शांत हो रहा है। काउंसलर यानि परामर्शदाता ने तीन-चार सिटिंग में इस समस्या को सुलझा दिया। जबकि वह स्वयं बेटे के व्यवहार के सामने हथियार डाल चुकी थी। वहीं पिछले छह माह से पारिवारिक कलह के कारण अलग रह रहे अंशुला और विकास अब एक साथ रहने लगे हैं। कारण, काउंसलर की मदद और सलाह से उन दोनों के बीच जो भी गलतफहमियां थीं, दूर हो गई हैं।  काउंसलर ने पर्सनल रिलेशनशिप सुधारने के कई मंत्र भी उन्हें दिए हैं।
क्या है काउंसलिंग ?
काउंसलिंग अर्थात परामर्श, यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत काउंसलर (परामर्शदाता) किसी भी व्यक्ति को उसकी व्यक्तिगत समस्याओं एवं कठिनाइयों को दूर करने की सलाह, सहायता तथा मार्गदर्शन देता है। जिंदगी जीने की ललक जगाता है। काउंसलर की मदद से व्यक्ति अपनी समस्याएं पहचानने, उन्हें दूर करने से जुड़े निर्णय लेने तथा स्वयं आत्मविश्वासी बनने में सक्षम हो जाता है। आज के दौर में निर्देशन (गाइडेंस) के तहत परामर्श एक आयोजित विशिष्ट सेवा के साथ-साथ सहयोगी प्रक्रिया बन गई है।
परामर्श के दौरान परामर्शदाता सलाह या सुझाव ही नहीं देते बल्कि संबंधित व्यक्ति के लिए एक दर्पण के समान कार्य करते हैं। काउंसलर इंटरव्यू तथा प्रेक्षण के जरिये सेवार्थी के पास जाता है और उसे उसकी शक्ति और सीमाओं का अहसास कराता है। उसमें आत्मविश्वास जगाता है।
काउंसलिंग एक प्रक्रिया 
व्यावसायिक निर्देशन के क्षेत्र में प्रमुख योगदान देने वाले प्रख्यात लेखक ई.डब्ल्यू.  मायस ने कहा है कि परामर्श देना महान कला है। पुराने वक्त का परामर्शदाता चौपाल में बैठा, दूर एक परिपक्व सामाजिक प्राणी था। जो समय व परिस्थिति के चलते ही अपने अनुभवों से दूसरों को ज्ञान देता था। लेकिन बदलते समय के साथ-साथ चौपालें बदल गईं और चौपालों पर बैठा वह परिपक्व इंसान भी। इसके साथ ही सलाह व परामर्श का स्वरूप भी बदल गया।
कौन होता है काउंसलर?
अपने क्षेत्र में प्रशिक्षित व्यक्ति होता है काउंसलर। जिसे लोगों की मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, वित्तीय तथा आध्यात्मिक जैसी समस्याओं तथा आवश्यकताओं का पूरा ज्ञान होता है।
अच्छे काउंसलर के गुण
एक अच्छे काउंसलर का काम है आपकी रुचि को समझाना और आपकी प्रतिभा को जानकर बढ़ावा देना। आप में आत्मविश्वास को बढ़ावा देना। समस्या की जड़ तक जाने के लिए आपको पूर्ण रूप से जानने के लिए आपसे व्यक्तिगत सवाल रहेगा। आपके परिवार स्कूल, कॉलेज, दोस्त, पड़ोसी से जुड़ी हर बात को जानेगा।  काउंसलर आपकी रुचि को जानकर सलाह देते हैं कि किस प्रकार की नौकरी करनी चाहिए। उनका काम आपके भविष्य को संवारना ही नहीं बल्कि मानसिक तौर पर भी मदद करना है।
डिमांड में है काउंसलिंग
आज आधुनिकता की ओर बढ़ते कदम, भागदौड़ से भरी जिंदगी तथा तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश में काउंसलिंग की परम्परा ने अपने पैर पसार लिए हैं। हालात यह है कि व्यक्ति की निजी हो या बाहरी समस्याएं इनके समाधान के लिए वह काउंसलर का दामन थामने से नहीं हिचकता। मसलन लोगों के समक्ष पहले की अपेक्षा अपने जीवन को सुचारू ढंग से जीने के लिए जितनी व्यापक संभावनाएं व विकल्प हैं, उससे कहीं ज्यादा विकट व असमंजस वाली स्थितियां भी हैं। ऐसे में लोगों की दिनचर्या प्रभावित हो रही है जिसका उनके जीवन पर खराब प्रभाव पड़ रहा है। ऐसे में उन्हें एक एक्सपर्ट की आवश्यकता पड़ रही है। जिससे काउंसलिंग की डिमांड बढ़ गई है। विशेष बात यह है कि इस चलन के चलते काउंसलिंग का क्षेत्र भी बढ़ रहा है।

Sunday, January 15, 2017

याद हॆ मुझे तुमने कहा था कि .... दर्द हो जब बेइन्तहा, आंखों से अश्क बहने लगें तब याद कर लिया करो ... मेरे प्यार को मेरी बातों को ....

Thursday, June 25, 2015

तुम मेरे क्या हो......

जिसने मेरे हर दुख दर्द को साझा किया वो सिर्फ तुम हो ....
जिसने मुझे हर छोटी से छोटी खुशी दी हॆ वो सिर्फ तुम हो ...
तुम मेरे गीत हो , तुम ही मेरे अकेलेपन के साथी हो ..
कॆसे बखान करूं कि तुम मेरे क्या हो,
ये समझ लो तुममें मॆने हर रूप को देखा हॆ .....
तुम तो मेरे लिए खुदा की किसी रहमत से कम नहीं...
तो कहो, तुम्हें ऒर क्या दूं मॆं इसके सिवाय कि तुमको मेरी उमर लग जाए ....

Thursday, January 1, 2015

Namaskaar ! Good Morning Friends ! Happy New Year 2015 !

Wednesday, June 18, 2014

फ़ैसला

चलो एक फ़ैसला कर लेते हैं ...
आज इस दुनिया को बांट लेते हैं.....
मैं और तुम एक हो जाते हैं ....
बाकी सब दुनियावालों पे छोड़ देते हैं .......

Saturday, June 14, 2014

महिला आरक्षण विधेयक पर लगी नजरें .......

16 वीं लोकसभा चुनावों में मिली अप्रत्याशित जीत एवम प्रचण्ड बहुमत हासिल कर भाजपा एवं राजद के नरेंद्र मोदी ने देश के प्रधानमंत्री का पदभार संभाल लिया है । मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही देश - दुनिया की नजरें उन पर टिक गई हैं । जनता की अपेक्षाएं भी बेइंतहा बढ़ गई हैं । इससे अपार जनसमर्थन प्राप्त मोदी सरकार के समक्ष देश की बागडोर संभालते ही चुनौतियों के पहाड़ खडे़ हो गये हैं । जगजाहिर है कि आज देश विभिन्न समस्याओं रूपी ज्वालामुखी के ढेर पर बैठा है , हालात बेकाबू हो गये हैं । जिनसे जुझने के लिये मोदी सरकार को अपनी सूझबूझ की रणनीति से ठोस कदम उठाने होंगे ।
यूं तो चुनावों के दौरान सभी  राजनीतिक दलों ने  अपने - अपने चुनावी घोषणा पत्र में तमाम वायदे किये थे । भाजपा एवं राजद के नेतृत्व वाली मोदी  सरकार ने भी तमाम वादे किये हैं , उनमें से यहां हम बात करेंगे महिलाओं से जुडे़ वादों की -----
भाजपा ने अपने पत्र में महिलाओं की सुरक्षा और कल्याण के साथ - साथ संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का कानून बनाए जाने पर अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की है । अब देखना यह है कि जिस महिला आरक्षण बिल [ नारी सशक्तीकरण का प्रतीक ] को पारित कर अमल में लाने का प्रयास पिछले 17  सालों से चल रहा है , पिछली यूपीए सरकार तमाम कोशिशों के बावजूद किन्हीं राजनीतिक दलों के विरोध और दांवपेचों के चलते लोकसभा में पारित नहीं कर पाई ,उसे मोदी सरकार कितने समय में पारित करवा पायेगी ।ऎसा करके वह महिलाओं कि उम्मीदों पर खरा उतर पायेगी या नहीं ।
क्या है महिला आरक्षण विधेयक -----
आजादी के बाद महिलाओं की बेहतरी और सत्ता में उन्हें हिस्सा देने की गरज से पिछले 18 वर्षों से संविधान के 108 वें महिला सशोधन विधेयक को लाने का प्रयास किया गया है। इस बिल के लागू होने से भारतीय राजनीति पटल का दृश्य ही बदल जायेगा क्योंकि इसके तहत भारतीय संसद में महिलाओं की भागीदारी 33 प्रतिशत आरक्षित हो जायेगी । फ़लस्वरूप भारतीय संसद में 248 और राज्य विधानसभाओं में 1223  महिलाएं आ जाएंगी , जिससे पुरुषों का वर्चस्व खत्म हो जायेगा । 543  सदस्यों वाली लोक्सभा में अभी तक महिला सांसदों की संख्या 61 से ऊपर नहीं पहुंची है तो राज्य विधानसभाओं में भी हालात कुछ अच्छे नहीं , यहां भी 4072 विधानसभाओं में महिला सदस्यों का आंकडा़ 300 तक ही पहुंच पाया है । जाहिर है इस बिल के आने से पुरुषों की संख्या सीमित हो जायेगी और महिलाओं की संख्या बढ़ जायेगी ।
देश की पहली लोकसभा में महिला सांसदों का प्रतिशत महज चार फ़ीसदी थी और आज भी यह आंकडा़ कुछ खास आगे नहीं बढा़ है । हाल ही में गठित 16वीं लोकसभा में भी मात्र 61 महिलाएं [अब तक की सबसे ज्यादा संख्या ] चुनकर आई  हैं जो  मात्र 11 फ़ीसदी ही हैं । अत: यह तय है कि इस विधेयक के लागू होने से भारतीय संसद में महिलाओं की संख्या बढ़ने से कोई नहीं रोक पायेगा ।
संसदीय व्यवस्था में महिलाएं----
देखा जाए तो भारत ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी महिलाओं की स्थिति अच्छी  नहीं है । विश्व की आधी आबादी होने के बावजूद समूची संसदीय प्रणाली में महिलाओं की भागीदारी सिर्फ़ 18.4 ही फ़ीसदी है । जबकि दुनिया में संसदीय प्रणाली वाले देशों की संख्या 187  है । इनमें से केवल 63  में द्विसदनीय व्यवस्था है , इनमें से भी महज 32 देशों में ही महिलाओं को वहां की संसद या उसके किसी सदन का अध्यक्ष बनने का अधिकार मिल सका है । इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन के मुताबिक 30 अप्रैल 2009 तक के आंकडो़ के अनुसार संसदीय व्यवस्था वाले देशों में सांसदों की कुल संख्या 44 हजार 113 थी ,इनमें महिला सांसदों की संख्या महज 8 हजार 112 थी । कुलमिलाकर देखा जाए तो महिलाओं की दयनीय तस्वीर ही सामने आती है । दुनिया की एक चौथाई संसदों में तो महिलाओं की संख्या नगण्य है । सऊदी अरब में तो महिलाओं को वोट डालने का भी अधिकार नहीं है ।
लोकतंत्र के सबसे बडे़ पैरोकार और मानवाधिकारों का ठेकेदार बनने वाले अमेरिका में कांग्रेस के दोनों सदनों - सीनेट और प्रतिनिधि सभा में सर्वाधिक 17.17 महिला सांसद ही चुनी गई । संसद में महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के मामले में भारत दुनिया में 134वें स्थान पर है।
देश मे आधी आबादी (महिलाएं) पिछले एक दशक से अपना प्रतिनिधित्व बढाने की मांग कर रही हैं लेकिन पुरूष प्रधान राजनीति संसद में महिला आरक्षण विधेयक पारित नहीं होने दे रही। अधिकांश पुरूष सांसद महिला सशक्तिकरण की बात जरूर करते हैं, पर समाज की "आधी आबादी" के लिए त्याग करने के लिए तैयार नहीं हैं। इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों की कथनी और करनी में अंतर दिखता है।
महिला आरक्षण की आवश्यकता ------
महिलाओं के उत्थान के लिए यह विधेयक आवश्यक है। लेकिन इसमें भी संशय है कि यह सिर्फ आम बिल बनकर रह जाए या महिलाओं को हक दिलाने में कारगर भी होगा।फ़िर भी  इस बिल के पेश होने के बाद उम्मीद है कि महिलाएं  आत्मविश्वास के साथ अपने हक की मांग करें। अपने अधिकारों को कानूनी रूप से प्राप्त करने के लिए वे स्वयं आगे आएं। कितने आश्चर्य की बात है कि इतने चुनावों के बाद भी महिलाओं की सत्ता में भागीदारी नगण्य है ।
स्त्री जब भी अपने अधिकार के लिए आगे आती है, तो उसे वह स्थान नहीं मिलता। वह चाहे राजनीतिक पार्टियों के टिकटों के बंटवारे का मामला हो या फिर नौकरी में आरक्षण का। किसी महिला को महत्वपूर्ण जगह मिल भी गई, तो उसे पुरुषवादी मानसिकता का चतुर्दिक सामना करना पड़ता है। उसे उसी पद्धति के भीतर रहना पड़ता है। वह अपनी आवाज उठाती है, तो उसे महत्वपर्ण जगह से हटा दिया जाता है। किरण बेदी के साथ भी तो यही हुआ। यह स्थिति तब तक बनी रहेगी, जब तक समाज के नजरिये में फर्क नहीं आएगा। समाज का मौजूदा नजरिया तो स्त्रियों को बर्दाश्त न करने वाला है।  समाज की मानसिकता बदलने की जरूरत है। समाज को बदलने की पहल भी महिलाओं को ही करनी होगी। महिलाओं को शिक्षित होना पड़ेगा।
कानून हमारे यहां हैं, लेकिन उनकी परिणति क्या होती है? बलात्कार जैसे जघन्य अपराध की एफआईआर तक को प्राथमिकता नहीं दी जाती। सच कहें, तो स्त्री को अधिकार मिलने में कानून, कागज और कार्रवाई के बीच बड़े अंतराल हैं। इन अंतरालों को हमें पाटना पड़ेगा। कोई कानून तभी प्रभावी होता है, जब सदिच्छा से उसे लागू किया जाए।
लबे समय से बहस में अटका है ये बिल -------
इस बात का खेद है कि पुरुष दोहरी मानसिकता के शिकार आज भी हैं । जिसके कारण महिलाओं के लिये विधायिका में 33 प्रतिशत स्थान आरक्षित करने का मुद्दा महज ख्यालों में ही अटक गया है । विभिन्न राजनीतिक दलों में ही इसे लेकर जबर्दस्त अंतर्विरोध है । इसके समर्थन और विरोध में अलग - अलग तर्क हैं । समर्थकों का मानना है कि विधायिका में महिलाओं का आरक्षण होने से देश की राजनीति में महिलाओं की संख्या बढे़गी तथा सामाजिक समर्थन का सपना भी साकार हो जायेगा । जबकि विरोधियों का मानना है कि इसके स्वरूप से सिर्फ़ उच्च वर्ग की महिलाओं को ही फ़ायदा पहुंचेगा । इसलिये ये लोग आरक्षण के भीतर अलग कोटे की मांग कर रहे हैं । जदयू अध्यक्ष शरद यादव , समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव आरक्षण के मौजूदा स्वरूप के हक में नहीं हैं । यही नहीं वर्तमान में भाजपा से सांसद चुनकर आई उमा भारतीभी आरक्षण के इस स्वरूप के विरोध में थीं , अब उनका रुख क्या होगा यह देखना महत्पूर्ण है ।
यह बिल, जो कि देश के चौथे प्रधानमंत्री राजीव गांधी का स्वप्न था , संसद में पहली बार 12 सितंबर 1996  को एच डी देवगौडा़ सरकार के समय लोकसभा में पेश किया गया । लेकिन उस वक्त भी इसके पक्ष - विपक्ष में बेहद शोर - शराबा हुआ और विधेयक अधर में लटक गया । इसके बाद अटल बिहारी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन [ एनडीए ] सरकार द्वारा 1998  में दोबारा पेश किया गया लेकिन 12 वीं लोकसभा के भंग होने से यह बिल फ़िर अटक गया । राजनैतिक दलों में आम सहमति न होने के कारण 23दिसंबर 1999 को तीसरी बार पेश किया गया यह बिल फ़िर पारित न हो सका । बार - बार पटरी से उतरता हुआ यह बिल किसी टेडी़ खीर से कम नहीं लगने लगा ।  तत्पश्चात डा. मनमोहन सिंह की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन [ यूपीए ] सरकार जब 2004  में सत्ता में आई तो उसने इस विधेयक को न्यूनतम साझा कार्यक्रम का हिस्सा बनाया और 2008 में यह विधेयक प्रस्तुत किया । लेकिन इस बार भी आरक्षण को लेकर राजनीतिक खेल खेले ।
ऎतिहासिक फैसला ---------
आखिरकार 14  साल की लम्बी जद्दोजहद के बाद आरक्षण बिल मार्च 2010 में राज्यसभा में लाया गया और भारी मतभेदों व ना - नुकुर के चलते यह पास हो गया । इस तरह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया और महिलाओं के हक में एक नई क्रांति की शुरुआत हुई।

विधेयक के रास्ते में बाधाएं --------
केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में पास करवाकर अवश्य ही अपने इरादे जता दिये हैं । सरकार की इस जीत के लिये सत्ता के साथ साथ विपक्षी दल भी बराबर के हकदार है ।किंतु आम सहमति ना बन पाने के कारण सरकार इसे लोकसभा के पटल पर नहीं रख पाई ।
वर्तमान राजनीतिक समीकरण में रोचक तथ्य यह है कि संप्रग के समर्थन में राजग प्रमुख भाजपा अपना समर्थन लिए खड़ी है। वामदल भी आरक्षण विधेयक के समर्थक हैं। राजद, द्रमुक, पीएमके दलित, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए भी आरक्षण चाहता है। सपा भी कोटे में कोटे की पक्षधर है। इस विधेयक के रास्ते में कई तकनीकी परेशानियाँ हैं क्योंकि यह संविधान में संशोधन करने वाला विधेयक है. ग्यारहवीं लोकसभा में पहली बार विधेयक पेश हुआ था तो उस समय उसकी प्रतियां फाड़ी गई थीं. इसके बाद 13वीं लोकसभा में भी तीन बार विधेयक पेश करने का प्रयास हुआ, लेकिन हर बार हंगामे और विरोध के कारण ये पेश नहीं हो सका था. महिला आरक्षण विधेयक एक संविधान संशोधन विधेयक है और इसलिए इसे दो तिहाई बहुमत से पारित किया जाना ज़रूरी है.
नई गठित मोदी सरकार पर उम्मीदें टिकीं --------
नरेन्द्र मोदी  की छवि एक आक्रामक नेता के रूप में रही है । हरेक नागरिक की बेहतरी की ख्वाहिश रखने वाले मोदी सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखते हैं । देश के नये प्रधानमंत्री से लोगों ने काफ़ी उम्मीदे लगाई हुई हैं वहीं देश की महिलाएं भी उम्मीद कर रही हैं कि मोदी सरकार उनकी सुरक्षा व्यवस्था  के अलावा महिलाओं को  बराबर की भागीदारी दिलाने वाला महिला आरक्षण विधेयक को पारित कर पास करवाने की दिशा में ठोस कदम उठाएं । उल्लेखनीय है कि   पिछले 18 सालों से दूसरी सरकारें इस विधेयक को लाने के लिये प्रयास तो कर रही हैं मगर कुछ राजनीतिक दलों के दोहरे रवैये के कारण आज तक ये विधेयक अधर में लटका हुआ है ।

Tuesday, May 13, 2014

ऎग्जिट पोल पर विश्वास नहीं .....

अगर आज कोई मुझसे पूछे कि मैंने किस पार्टी को वोट दिया है तो मैं इस बात का खुलासा हर्गिज नहीं करूंगी कि मैंने किसे वोट दिया है ...इसलिये मैं नहीं समझती कि दूसरे लोग भी अपने वोट का खुलासा करने के हक में होंगे ...और यदि ऐसा है तो एग्जिट पोल के सर्वे विश्वास करने के काबिल नहीं हैं .............

Tuesday, May 6, 2014

अंधविश्वास के चक्कर में ना पडे़ं ..........

आजकल सोशल नेटवर्किंग साइट फ़ेसबुक के साथ - साथ मोबाइल एप्स के माध्यम से आने वाले मैसेजेस में एक अजीब रिवाज चल पडा़ है । जिसके तहत देवी - देवताओं की तस्वीर चस्पा कर उसमें लिखा जा रहा है कि इसे देखकर तुरत लाईक करो या इस मैसेज को  कम से कम 9 - 10  लोगों को भेजो । इससे तुम्हारे मन की मुराद पूरी होगी और यदि ऐसा नही किया तो तुम्हे कोई बुरी खबर मिलेगी या बदकिस्मत हो  जाओगे ।
बडे हैरत की बात है कि कुछ लोग ऐसी हरकतें करके अंधविश्वास फैलाने में लगे हैं और हम लोग बडी़ आसानी से उनके झांसे में आकर अपनी सूझबूझ खोकर ऐसी फोटोज को लाइक कर आगे भेज रहे हैं । ये भी नही सोचते कि क्या ऐसे मैसेजेस भेजने या लाइक करने से कभी किसी की मन्नत पूरी हुई है जो अब तुम्हारी होगी ? जबकि ऐसे मैसेजेस सिवाय उलझन ही पैदा करते हैं ।  साथ ही ये मैसेजेस टेंशन देने के अलावा अंधविशवास को भी फैलाते हैं ।
अत: फ़ेसबुक यूजर्स और मोबाइल यूजर्स सावधान रहें और बिना किसी डर के तथा अंधविश्सवास में पडे  ऐसे मैसेजेस को डिलीट करें । और भेजने वालों से गुजारिश है कि वे अजीबोगरीब हरकतें करना बंद करें और अपने कर्म पर ध्यान दें । क्योंकि आपके साथ अच्छा या बुरा जो भी होता है वो सब आपके कर्मो से ही तय होता है ।  ज्यादा कुछ नहीं तो दूसरे लोगों को शांति से जीने दें ।

Monday, May 5, 2014

३० मई को रिलीज़ हो रही है फिल्म बाबा रामसा पीर

  

३० मई को रिलीज़ हो रही है फिल्म “बाबा रामसा पीर’. राजस्थान के जाने माने संत ‘बाबा रामसा पीर’ की इस फिल्म का निर्माण किया है औशिम खेत्रपाल ने. जिन्होंने इस फिल्म से पहले  “शिरडी साईं बाबा”  नामक फिल्म बनाई थी. अभिनेता औशिम खेत्रपाल ऐतिहासिक फिल्म “बाबा रामसा पीर” में बाबा के चरित्र को अभिनीत कर रहे हैं. इस फिल्म से पहले इन्होने फिल्म ‘शिरडी साईं बाबा’ में भी अभिनय किया था.    
१४ शताब्दी में एक संत थे जिनका नाम रामसा था जिन्होंने सबसे पहले हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश फैलाया जिन्हें हिंदू बाबा और मुसलमान पीर कहते थे और दोनों ही इनकी पूजा करते थे. यह नाम बाबा को फारस के इनके ५ साथियों ने ही दिया था जो की उस समय भारत आये थे. इन्हीं “बाबा रामसा पीर” की कहानी पर आधारित है यह फिल्म, जिसका निर्माण हुआ है सतीश टंडन  प्रोडक्शन एंड ओरिएंट ट्रेडलिंक लिमिटेड के बैनर में.           
 इस फिल्म में अभिनय किया है साईं भक्त के रूप में विश्व में प्रसिद्ध औशिम खेत्रपाल और अभिनेत्री ग्रेसी सिंह ने. फिल्म की शूटिंग हुई है मुंबई, जोधपुर, जयपुर और रोंचा गाँव जहाँ पर बाबा रामसा की समाधि है. यह फिल्म राजस्थानी और हिंदी आदि दो भाषाओ में बनी है. इस फिल्म में हिंदी, राजस्थानी भाषा के साथ-साथ गुजराती भाषा में भी मधुर गीत संगीत है जो कि निश्चित रूप से श्रोताओ  को पंसद आएगा.
३० मई को रिलीज़ हो रही है फिल्म  
 बाबा रामसा पीर
३० मई को रिलीज़ हो रही है फिल्म “बाबा रामसा पीर’. राजस्थान के जाने माने संत ‘बाबा रामसा पीर’ की इस फिल्म का निर्माण किया है औशिम खेत्रपाल ने. जिन्होंने इस फिल्म से पहले  “शिरडी साईं बाबा”  नामक फिल्म बनाई थी. अभिनेता औशिम खेत्रपाल ऐतिहासिक फिल्म “बाबा रामसा पीर” में बाबा के चरित्र को अभिनीत कर रहे हैं. इस फिल्म से पहले इन्होने फिल्म ‘शिरडी साईं बाबा’ में भी अभिनय किया था.    
१४ शताब्दी में एक संत थे जिनका नाम रामसा था जिन्होंने सबसे पहले हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश फैलाया जिन्हें हिंदू बाबा और मुसलमान पीर कहते थे और दोनों ही इनकी पूजा करते थे. यह नाम बाबा को फारस के इनके ५ साथियों ने ही दिया था जो की उस समय भारत आये थे. इन्हीं “बाबा रामसा पीर” की कहानी पर आधारित है यह फिल्म, जिसका निर्माण हुआ है सतीश टंडन  प्रोडक्शन एंड ओरिएंट ट्रेडलिंक लिमिटेड के बैनर में.           
 इस फिल्म में अभिनय किया है साईं भक्त के रूप में विश्व में प्रसिद्ध औशिम खेत्रपाल और अभिनेत्री ग्रेसी सिंह ने. फिल्म की शूटिंग हुई है मुंबई, जोधपुर, जयपुर और रोंचा गाँव जहाँ पर बाबा रामसा की समाधि है. यह फिल्म राजस्थानी और हिंदी आदि दो भाषाओ में बनी है. इस फिल्म में हिंदी, राजस्थानी भाषा के साथ-साथ गुजराती भाषा में भी मधुर गीत संगीत है जो कि निश्चित रूप से श्रोताओ  को पंसद आएगा.

Saturday, September 21, 2013

ये तीन चीजें ---सोचो , समझो और पढो़ .....

तीन चीजें जिंदगी में एक बार मिलती हैं .....
-मां - बाप
 वक्त
दोस्त

ये तीन चीजें समझकर उठाओ ----
कदम
कसम
कलम

ये तीन चीजें सोच कर करो ------
प्यार
 बात
 फैसला

ये ती चीजें किसी का इंतजार नहीं करती ----
मौत
 वक्त
उमर

ये तीन चीजें छोटी न समझो ----
कर्ज
फर्ज
रिश्ता

ये तीन चीजें हमेशा दर्द देती है  -----
 धोखा
गरीबी
 यादें
 इन तीन चीजों से हमेशा आप खुश रहेंगे -------
गॉड
फेमिली
दोस्ती


है ना तीन चीजो का मतलब .......

Monday, July 8, 2013

Santosh Anand ji in Delhi

Wednesday, July 4, 2012

लोकतंत्र से देश को खतरा : सुरेन्दर शर्मा

 
 आज इस देश में लोकतंत्र को कोई खतरा नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की वजह से देश को खतरा है. जाने माने हास्य कवि सुरेंदर शर्मा ने आज के राजनीतिक हालात और नेताओं पर अपनी जानी पहचानी चुटीली शैली में व्यंग बाण छोड़े। शर्मा पीतमपुरा स्थित गुरू गोविंद सिंह कॉलेज में भिवानी मैत्री परिवार की तरफ से आयोजित मधुप जयंती समारोह के मौके पर हास्य कवि सम्मेलन में त्रोताओं को ना केवल जमकर हंसाया बल्कि सोचने पर भी मजबूर किया। कवि सम्मेलन में डा गोविंद व्यास, कुंवर बैचेन, गजेन्द्र सोलंकी, राजेंद्र कलकल और अनिल अग्रवंशी ने भी अपनी रचनाओं से लोगों का खासा मनोरंजन किया।पंजाब केसरी के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार अश्विनी चोपड़ा इस कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि मौजूद थे. उन्होंने मधुपजी    
   साहित्य की भूरी भूरी प्रशंसा करते हुए लोगों को इसे गंभीरता से पढने की अपील की. श्री चोपड़ा ने भिवानी 
 परिवार मैत्री संघ द्वारा किये जा रहे जनहित के कार्यों की भी सराहना की. 
भिवानी परिवार मैत्री संघ के संरक्षक सुधाकर गुप्ता के मुताबिक मधुप जयंती समारोह का आयोजन भिवानी के मूल निवासी और हरियाणा के जाने माने कवि महाबीर प्रसाद मधुप की याद में किया जाता है। कार्यक्रम में मधुप के गजल संग्रह कारवां उम्मीद का का विमोचन किया गया. जबकि साहित्य में खास योगदान के लिए हरियाणा साहित्य अकादमी के सचिव माधव कौशिक को मधुप काव्य सम्मान से नवाजा गया। श्री माधव कौशिक और श्री अश्विनी चोपड़ा ने भिवानी परिवार मैत्री संघ को हर संभव मदद देने का वादा किया . दोनों ने ही मधुप जी की याद में शुरू किये गए किसी भी कार्य में  पूरा सहयाग करने का भी भरोसा दिलाया. समारोह का आयोजन  श्रीमती सरबती देवी गुप्ता के सान्निध्य में किया गया. इस कार्यक्रम में शिक्षाविद और विद्या भारती के महासचिव नरेंद्र जीत सिंह रावल , एस्कॉर्टस अस्पताल के निदेशक डा़ सुमन भंडारी, राष्ट्रीय कवि संगम के अध्यक्ष जगदीश मित्तल, समाजसेवी कुसुमाकर गुप्ता, तुगलकाबाद ट्रेडर्स एसोसिअशन के अध्यक्ष ओपी गोयल, बीजेपी नेता महेंद्र चावला,ठाकुर विक्रम सिंह, निगम पार्षद अरविंद गर्ग लायंस क्लब के गवर्नर सुरेश गुप्ता, अग्रवाल मूवर्स एण्ड पैकर्स के रमेश अग्रवाल,व्यवसायी सुदर्शन जैन , समाजसेवी सतीश गुप्ता, न्यूज एक्प्रैक्स चैनल के दिल्ली एनसीआर प्रमुख अतुल सिंघल समेत कई गणमान्य लोग उपस्थित थे। बीपीएमएस के महासचिव अरविन्द गर्ग ने उपस्थित लोगों को संस्था के काम काज की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि भिवानी परिवार मैत्री संघ हरियाणा के भिवानी जिले के मूल निवासियों के उन परिवारों का समूह है जो दिल्ली और आस पास के इलाकों में रहते हैं. श्री गर्ग के मुताबिक संघ आजकल अपने सदस्यों को दिल्ली में एक अदद छत मुहैया करवाने के लिए एक आवासीय परियोजना पर काम कर रहा है. इसके अलावा सद्स्यों की एक डायरेक्ट्री के प्रकाशन का काम भी चल रहा है. जबकि अंतर्राष्ट्रीय कवि और भिवानी परिवार मैत्री संघ के अध्यक्ष राजेश चेतन ने खूबसूरत मंच संचालन किया. चेतन ने समारोह को सफल बनाने के लिए अपने कोषाध्यक्ष जगदीश गोयल , कार्यकारिणी सदस्यों प्रमोद शर्मा, दिनेश गुप्ता, सुभाष गर्ग, राजीव गुप्ता, अशोक भारद्वाज, सुशील गनोत्रा, सुरेश अग्रवाल,पवन मोड़ा, अनिल सर्राफ, राजेन्द्र जालान, राजकुमार अग्रवाल और संरक्षक सत्य नारायण गुप्ता का धन्यवाद किया. चेतन ने बताया कि हमारी माटी हमारी विरासत बीपीएमएस का मूल मन्त्र है. इसलिए संस्था समाज की भलाई के काम करती  रहेगी.

Friday, March 23, 2012

हिंदू नववर्ष नुबारक हो........

आज 23 मार्च २०१२ से हिन्दू नववर्ष एवं विक्रम शक संवत्सर २०६९का आरंभ हो गया है. हिन्दू नववर्ष के आरंभ के साथ ही नवरात्र भी प्रारंभ हो गए हैं. बसंत ऋतु के आगमन का संकेत मिलने लगता है, और वातावरण खुशनुमा एहसास कराता है. हिन्दू नववर्ष का आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है. ब्रह्मा पुराण के अनुसार सृष्टि का प्रारंभ इसी दिन हुआ था.ब्रह्माजी द्वारा सृष्टि की रचना प्रारम्भ करने के दिन से ही नव वर्ष का आरम्भ होना माना जाता है .इसी दिन से ही काल गणना का प्रारंभ हुआ था. सतयुग का प्रारंभ भी इसी दिन से माना जाता है.यह दक्षिण भारत में सर्वाधिक प्रचलित है ।
इस बववर्ष से और भी कई अधिक ऎतिहासिक संदर्भ जुडे़ हुए हैं । जैसे - मर्यादा पुरुषोत्तम राम का राज्याभिषेक दिवस , शक्ति की आराधना हेतु नवरातत्र आरम्भ , महर्ष दयानन्द जी द्वारा आर्य समाज की स्थापना , राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डा. केशव बलीराम हेडगेवार जी का जन्म दिवस , देव भगवान झूलेलाल जी का जब्नदिवस , धर्मराज युधिष्ठिर का राजतिलक आदि ।
लेकिन बडे़ दुख का विषय है कि आज नई पीढी़ हिंदू नववर्ष से एकदम अनभिज्ञ है , वह अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक पहली जनवरी को नया साल बडे़ ही जोशों - खरोश के साथ मनाती है मगर हिंदू नववर्ष पर उनका ध्यान ही नहीं रहता है । आज आवश्यकता है तो इस बात की कि हिंदू नववर्ष का प्रचार - प्रसार ज्यादा से ज्यादा किया जाए ताकि नई पीढी़ का ध्यान इस ओर खींचा जा सके ।  तो आइए जिस तरह हम जोर शोर से अंग्रेजी केलेण्डर के मुताबिक १ जनवरी को नया साल मनाते हैं ।  उससे कहीं ज्यादा जोश व उमंग के साथ नव संवत्सर 2069 का स्वागत करें ..........

Saturday, March 17, 2012

दो बूंद कमाल की ...


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Wednesday, February 1, 2012

कैंसर जागरूकता कैम्प 5 फरवरी को

कैंसर एक जानलेवा बीमारी है , लेकिन थोडी़ सी जागरूकता से इस बीमारी से बचा जा सकता है । यह कहना है अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के प्रमुख प्रोफेसर जी के रथ का । प्रोफेसर रथ के अनुसार इस बीमारी से कैसे बचा जाए , लोगों को इस बारे में जानकारी का अभाव है इसलिए कैंसर विभाग के डॉक्टर लोगों के बीच जाकर उन्हें जागरूक करना चाहते हैं ।
 आने वाली 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवस भी मनाया जा रहा है । इसी कडी़ में आगामी 5 फरवरी को महाराजा अग्रसैन भवन , रोहिणी सैक्टर 8 में कैंसर जागरूकता कैम्प का आयोजन किया जा रहा है । कैम्प आयोजन का समय दोपहर दो बजे से पांच बजे है ।  श्रीमती उषा हेल्पेज एसोसिएशन द्वारा यह कैम्प एम्स और भिवानी परिवार मैत्री संघ के सहयोग से लगाया जा रहा है ।इस कैम्प में  लोगों का रजिस्ट्रेशन करने के साथ - साथ जरूरत पड़ने पर उनका प्राथमिकता के आधार पर एम्स में इलाज किया जाएगा । आयोजकों ने लोगों से कहा कहा है कि वे ज्यादा संख्या में पहुंचकर लाभ उठाएं ।

Saturday, December 31, 2011

नया साल मुबारक हो .......................

तो दोस्तों .. धीरे - धीरे समय अपनी चाल से आगे बढ़ रहा है और इसीके साथ नया साल 2012 के आने की घडी़ नजदीक आती जा रही है । नये साल के स्वागत के लिय हर कोई अपनी - अपनी तरह से तैयार है । बाजार सज गये हैं , स्कूल बंद हो गये हैं । मॉल्स, पब्स , रेस्तरां , होटल्स आदि का नजारा देखने लायक है । सभी नववर्ष का जश्न मनाने को उत्साहित हैं ।इधर 2011 अंतिम पडा़व पर हम सबसे विदा लेने को तैयार है ।एक साल और हमारी जिंदगी से गुजर जाएगा । अत: जिंदगी के बसंत में एक और बसंत जोड़कर 2011 का यह साल हमें ना जाने कितनी अनगिनत यादें देकर छोड़ जा रहा है । लेकिन यह भी सही है कि ये साल चलते - चलते हमें 2012 के रूप में एक नया साथी देकर जा रहा है , जिसके साथ हमें पूरे 365 दिन हंसते मुस्कुराते बिताने हैं ।

         हालांकि ये साल 2011 हर क्षेत्र में काफी उथल - पुथल भरा रहा । कई ऎसी घटनाएं , वारदातें व हलचलें हुईं जिन्हें भुला पाना नामुमकिन है । फिर भी जिंदगी संघर्षों से जूझते रहने का नाम है , यह ध्यान में रखते हुए जो बीत गया सो बीत गया उसे भूल जाएं और जो आने वाला है उसका उत्सव मनाएं । इस जाने वाले साल को बेहतरीन व यादगार विदाई दें तथा पूरी गर्मजोशी से आने वाले साल 2012 का स्वागत करें ।
      गौर फरमाईए कुच किसी की और कुछ मेरी कही चंद लाईनों पर ........
 
      सदा दूर रहो गम की परछाईयों से ,
      सामना ना हो कभी तन्हाईयों से ,  
      जो बीत गया उसे बीत जाने दो
      मगर सबक लो उन बीती बातों से ,
     जो कुछ करने की तमन्ना यूं रखते हो
     तो आओ .....
    उसे पूरा करने का प्रण लेते हैं ....
    एक बार फिर से .....
   हर अरमान - हर ख्वाब आपका पूरा हो
   यही कामना है दिल की गहराईयों से ..
   भले 2011 से ना कुछ मिल पाया है
   मगर ....
   2012  खुशियों की सौगात लेकर आया है ............

अंत में सभी दोस्तों , परिजनों , परिचितों को नए साल की बहुत - बहुत  बधाईयां.......



Thursday, December 15, 2011

देर आयद - दुरुस्त आयद ...

दिल्ली के उपराज्यपाल तेजेन्द्र खन्ना द्वारा मेयर व एमसीडी नेताओं के विदेशी टूर को रद्द करने को लेकर जहां एमसीडी में अंदरूनी तौर पर अफरा - तफरी मच गई है , वहीं उपराज्यपाल का यह निर्णय दिल्ली की जनता नए साल का तोहफा मान रही है । हालांकि ऎसा निर्णय बहुत पहले ही लिया जाना चाहिए था , खैर देर आयद - दुरुस्त आयद यानि जब जागो तभी सबेरा ।
यह सही है कि नेता लोग  स्टडी टूर  के नाम पर हर वर्ष नए साल के अवसर पर छुट्टियां मनाने विदेशों की सैर पर जाते थे और विदेश से स्टडी के नाम पर मौज - मस्ती की यादें लेकर लौटते थे । इस टूर पर हर साल लाखों का खर्चा आता रहा है , जिसकी भरपाई किसी न किसी बहाने दिल्ली की जनता को ही करनी पड़ती रही है ।
इसे अन्ना प्रभाव कहा जाए या कुछ और , मगर यह सच है कि दिल्ली के उपराज्यपाल को समझ आ गई है कि उन्हें जनता के हित में काम करने के लिए क्या कदम उठाने चाहिये । उन्होंने खर्चों में कटौती के नाम पर सबसे पहले अपने नेताओं के विदेशी टूर पर रोक लगा कर एमसीडी का  लाखों का खर्च होने से बचाया है । उधर इस फरमान से आम जनता पर पड़ने वाले अतिरिक्त भार को पड़ने से भी रोका है । संभवतया अब ये लाखों रुपयों की बचत जनसुविधाओं को संवारने के काम में लाई जाएगी और जनता की गाढी़ कमाई जनता के ही काम आ सकेगी ।
राजनीतिक हलकों में उपराज्यपाल का यह फैसला भले ही राजनीति से प्रेरित बताया जा रहा है , लेकिन तेजेन्द्र खन्ना का यह कदम सराहनीय है । उम्मीद की जाती है कि भविष्य में  दूसरे नेता भी इससे सीख लेकर जनहित में फैसले लेते रहेंगे और तमाम सरकारी दफ्तरों में व्याप्त भ्रष्टाचारी , हरामखोरी व फिजूलखर्ची पर रोक लगाएंगे .....

Sunday, December 4, 2011

हर फिक्र को धूंए में उडा़ता चला गया……….

हिन्दी फिल्मी दुनिया के सदाबहार हीरो देवानन्द जी अब हमारे बीच नहीं रहे । उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए हम कमना करते हैं कि भगवान उनकी आत्मा को शान्ति दे । देव साहब के जाने से फिल्मी दुनिया के एक युग का अंत हो गया है । दे्व साहब का स्वास्थ्य कुछ दिनों से ठीक नहीं चल रहा था और अपने चेकअप के लिए वे लंदन आए हुए थे।
देवानंद ने 1946 में ”हम एक हैं” से फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखा था । इसके बाद उन्हें कई फ़िल्में मिलीं और एक वर्ष बाद जिद्दी के आने तक वे बड़े अभिनेता के रुप में स्थापित हो गए थे.
देवानंद ने कई बेहतरीन फ़िल्में की और अपने अभिनय का लोहा मनवाया। पेइंग गेस्ट, बाज़ी, ज्वेल थीफ, गाइड, सीआईडी, जॉनी मेरा नाम, अमीर गरीब, हरे रामा हरे कृष्णा और देस परदेस जैसी उन्होंने कई फिल्में दीं । देवानंद को २००१ में पद्मभूषण और २००२ में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे फिल्मों में सक्रिय थे और कुछ फिल्मों का निर्देशन और निर्माण कर रहे थे।
यूं तो देव साहब की फिल्म के कई गाने हिट रहे जो आज भी कानों को सुकून पहुंचाने हैं ।लेकिन आज मुझे उनका ये गीत बहुत याद आ रहा है — मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया …हर फिक्र को धूंए में उडा़ता चला गया……….