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Monday, July 28, 2008

सेव गर्ल


देखिये ये तस्वीर आपसे क्या कुछ नही कह रही इसकी मूक भाषा को समझो और अमल करो

Tuesday, July 15, 2008

औरत ही औरत की दुश्मन ?

अभी मैं अन्नू का ब्लॉग पढ़ रही थी , अन्नू की लिखी 'औरत के हक़ में ' पोस्ट पढ़ी , अच्छा लगा यहाँ मुझे भी कुछ कहने की उत्सुकता हुई सबसे पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहूंगी कि अगर आज कोई महिला घर से बाहर कदम निकालती हैया परिवार में रहते हुए अपने हक़ व् अधिकारों कि बात कराती है तो सबसे पहले उसे अपने घर के सदस्यों का सामना करना पढता है जिनमें न सिर्फ मर्द जात होती है बल्कि उनमें औरत जात भी शामिल होती है कहने का मतलब है कि समाज तो बाद की बात है पहले तो उसे अपने घर परिवार में मौजूद सास , ननद ,या माँ - बहन के कुटिल सवालों का डटकर मुकाबला करना पढता है इनसे निपटने के बाद आती है बारी समाज में बैठे अन्य पहरेदारों की सच मानिए तो प्राचीन समय में समाज के ठेकेदारों ने व्यवस्था ही कुछ ऐसी बना डाली कि एक औरत को समाज का सबसे कमजोर प्राणी मानकर उसे शुरू से ही अपने तथा पैरों तले दबाकर तथा पैरों की जूती मानकर घर कि चारदीवारी में कैद करके रखा शुरू से ही ऐसी परम्परा चली आई कि औरत को मात्र घर को सँभालने वाली व उपभोग कि वास्तु माना गया शायद यही वजह रही कि दबाव में रहते - रहते औरत स्वयम औरत जात कि ही दुश्मन बन बैठी अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों व जुल्म कुंठा को वह अपनी बेटी या बहु पर निकालती आ रही है और अब जबकि ज़माना बिल्कुल बदल गया है तो आज भी यह बदली तस्वीर पुरानी पीढी को नही भा रही है बदलते युग में महिलाओं कि स्थिति भी काफी बदली है , आज शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहाँ महिलाओं की भागीदारी न हो । आज महिला पहले की तरह अबला नहीं रही , आज की सबला महिला अपने हक व अधिकारों के लिए लड़ना बखूबी जानती है । लेकिन ऐसा नहीं कि महिलाओं ने इस बदलाव की मंजिल को आसानी से पार कर लिया हो ? खैर वह मंजिल ही क्या जिसे आसानी से पा लिया जाय ।
अंतत: आज जमाना बराबरी का है यानी जो सुविधाएं व हक एक बेटे का है वही हक व सुविधाओं की दरकार एक बेटी को भी है । आज बेटा - बेटी के पालन - पोषण में किसी भी तरह का भेदभाव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा । और इस काम को करने के लिये एक महिला को ही हिम्मत से काम लेना होगा ।

Sunday, July 13, 2008

ड्राइविंग के वक्त बोलना नुकसानदेह होता है

हाल ही में हुए एक अध्ययन के अनुसार ड्राइविंग करते वक्त बात करना काफी नुकसानदेह हो सकता है । वैसे तो अगर ड्राइवर बातें सुन भी रहा है तो भी उसका ध्यान बंटता है , किंतु सुनने से ज्यादा बात करना ड्राइवर का ध्यान बंटाता है ।
द जनरल ऑफ एक्सपेरिमेंटल साइकलॉजीमें प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार १२ वयस्क ड्राइवरों, जिनका ड्राइविंग रिकार्ड अच्छा था, को चार घंटे तक हाईवे पर ड्राइविंग करवाई गई और इस बात पर ध्यान दिया गया कि वे ड्राइविंग के वक्त किस बात से प्रभावित होते हैं ? ड्राइविंग करते समय उन्हें तरह - तरह के संदेश सुनाए गए और फिर ड्राइवरों को इन संदेशों के बारे में बात करने को कहा गया । इस दौरान ध्यान दिया गया कि उनका ध्यान ड्राइविंग पर कित्ना केंद्रित रहता है । विशेषग्य अपने इस अध्ययन से इअस निष्कर्ष पर फुंचे कि सुनते वक्त उनकी ड्राइविंग पर खास फर्क नहीं पडा लेकिन बोल्ते वक्त उनका ध्यान ड्राइविंग से अधिक हटा ।
इसीलिए इस बात पर काफी जोर दिया जाता रहा है कि ड्राइविंग के वक्त ना तो आपस में किसी से बात करें और ना ही मोबाइल फोन का ड्राइविंग के वक्त प्रयोग करें । लेकिन देखने में आया है कि लाख कोशिशों के बावजूद , बार - बार चेतावनियां देने के बाद भी कई लोग ड्राइविंग के दौरान मोबाइल फोन का धड्ल्ले से प्रयोग करते हैं । जबकि उनकी यह आदत स्वयं उनके लिए व दूसरों के लिए भी जानलेवा साबित हो सकती है । काश लोग इस बात को समझ पाएं................

Saturday, July 12, 2008

नई सीट बेल्ट !

आरुषी मर्डर केस की गुत्थी सुलझी ?

सी बी आई ने अब तक की सबसे बडी मर्डर मिस्ट्री आरूषी हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने का दावा कर कांड के मुख्य आरोपी कृष्णा, राजकुमार व विजय मंडल को गिरफ्तार कर्के जेल भेज दिया है । इसके अलावा आरूषी के पिता डॉक्टर तलवार को ,उन्के खिलाफ कोई सबूत न मिल पाने की बिना पर ,क्लीन चिट दे दी और इसी बिनापर डॉक्टर तलवार को अदालत ने जमानत पर रिहा कर दिया है । अब भले ही डॉ. तलवार ने बेटी का कत्ल नहीं किया है मगर सीबीआई की कहानी हजम नहीं हो पा रही है । क्योंकि अभी तक कई एसे सवाल हैं जिनका जवाब अभी भी बाकी है ?
अगर सीबीआई की कहानी को माने तो बडे हैरानी होती है कि बगल के कमरे में डॉक्टर दम्पति सोते रहे और उन्हें घर में हो रहे तांडव की कानोकान खबर तक नहीं लगी ?
-घर में रह रहे नौकर हेमराज की इतनी हिम्मत कैसे हो गई कि वह रात के समय घर में तीन दोस्तों को बुलाकर जाम से जाम टकराता है और डॉक्टर साहब को भनक तक नहीं लगती है ?
-पहले कहा जा रहा था कि डॉक्टर साहब सोने से पहले बेटी के कमरे का बाहर से ताला लगाकर ही सोते थे , फिर उस रात न तो कमरे में बाहर ताला था और न ही कमरे का अंदर से कुंडा लगाया गया था , आखिर क्यों ?
-सीबीआई के दावे में कुछ स्पष्ट नहीं हो रहा है कि पूरा हत्याकांड प्री प्लान था या शराब पीकर तैश में उठाया गया कदम ?
-चलिए मान लिया कि हत्याकांड में तीनों आरोपियों का हाथ है ,अगर एसा है तो अभी तक हत्या में प्रयोग किए गए वेपन अभी तक बरामद क्यों नहीं किए जा सके हैं ?
-इस पूरे डबल मर्डर केस में डॉक्टर तलवार की चुप्पी किसी अन्य राज की और इशारा कर रही है ?
बहरहाल ,केस की गुत्थी को भले ही सुलझा हुआ मान लिया जाए लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद यह कहानी गले से नीचे नहीं उतर रही है ?

Tuesday, July 8, 2008

जब फेल ही नहीं होंगे तो पडाई कैसी?

Thursday, July 3, 2008

प्ले स्कूल : बच्चो के भविष्य को सुदॄड बनाने का सपना

बच्चे कल का भविष्य है और इसी बात को ध्यान मे रखते हुए हर माता - पिता का यही सपना होता है कि उनका बच्चा आने वाले समय मे देश का होनहार नागरिक बने तथा अपने माता - पित्ता का नाम रोशन करे । इसी हसरत को दिल मे लेकर हर मा - बाप की यही कोशिश होती है कि वह अपने बच्चे को अच्छे से अच्छे स्कूल मे तालीम दिलाए । समय की मान्ग को देखते हुए आज अच्छे से अच्छे स्कूलो की भी कोई कमी नही है । इसी दिशा मे पिछ्ले माह lakshya एजूकेशन सोसायटी ने बच्चो का एक प्ले स्कूल ब्रैट्स एन्ड क्यीटीज खोला है । इस स्कूल को खोलने का मकसद भी वही है कि आज के बच्चे केर कल को सवारना । अब यह कहना भविष्य के गर्त मे है कि स्कूल के सन्स्थापक अपने मकसद मे कितने कामयाब होन्गे ?
स्कूल के शुभारम्भ के अवसर पर सोसायटी के मुख्य देवेन खुल्लर ने दावा किया कि इस स्कूल मे बच्चो मे भारतीय सन्स्कॄतिऔर वैश्विक पटल पर उनकी उडान की तैयारी को ध्यान मे रखते हुए विश्व स्तरीय एजूकेशन देने की कोशिशे की गई है । उन्होने बतायाकि १६ महीने की कडी मेहनत के बाद उन्होने पाठ्यक्रम को १६ से १८ महीने के बच्चे के विकास के अनुसार बान्टा है । पूर्ण वातानुकूलित क्लासरूम मे खेल-खिलौने,जादू,कम्प्यूटर आदि की सुविधा भी बच्चो को दी जा रही है । साथ ही उन्होने यह भी बताया कि इस स्कूल को खोलने के पीछे मेरी प्रेरणा मेरी बेटी है । यह मेरी मा का सपना भी था कि मैअपने बच्चो को अन्य अभिभावको की तरह किसी बडे स्कूल मे न भेजकर खुद एक अच्छे स्कूल का निर्माण करू ।
बहरहाल , स्कूल के साथ् हमारी शुभकामनाए है किन्तु हम यह भी उम्मीद करते है कि स्कूल मैनेज्मेन्ट कही अपने उदेद्श्य से भटक न जाए और समय की रफ्तार के साथ वह भी औरो की तरह स्कूल को अपनी कमाई का जरिया ना बना बैठे ।

Thursday, June 26, 2008

क्या करे बेचारे विद्यार्थी ?

विद्यार्थी जीवन के ३६५ दिन का लेखा-जोखा ......
यदि वह फेल होता है तो इसमे बेचारे विद्यार्थी का कोई दोष नही है क्योकि साल मे केवल ३६५ दिन होते है ,जबकि विद्यार्थी के पास पढ्ने के लिए एक दिन भी नही होता । आप जानना चाहेन्गे कि ऎसा कैसे हो सकता है ? आईए, आपको बताते है विद्यार्थी जीवन के ३६५ दिन का लेखा-जोखा ........
१--साल मे ५२ रविवार होते है और रविवार ’छुट्टी का दिन’ होता है । सप्ताह मे यही दिन है जबकि छह दिन की आपा - धापी के बाद रविवार को बिना किसी रोक - तोक के थोडा सुख चैन व आराम कर सकते है । मसलन ३६५ मे से ५२ दिन निकाल्कर्बच्ते है ३१३ दिन ।
२--मई-जून काफी गर्म दिन होते है , इस करणइन दिनो ५० दिन की समर होली डे यानि कि गर्मियो की छुट्टिया होती है । गर्मियो मे पडाई कर पाना मुश्किल होता है । बचे २६३ दिन ।
३--प्रतिदिन कम से कम ८ घन्टे सोने की हिदायत दी जाती है सो १३० दिन सोने मे चले गए, बचे १४१ दिन ।
४--अच्छे स्वास्थ्य के लिए १ घन्टा प्रतिदिन खेलना आवश्यक है, मतलब १५ दिन खेल के नाम हो गए । अब रह गए १२६ दिन ।
५--कम से कम दो घन्टे प्रतिदिन खाना खाने तथा अन्य स्वादिष्ट भोजन व फलादि खाने मे लग जाते है जिससे हुए ३० दिन । रह गए ९६ दिन ।
५--समाज मे रहते हुए सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने हेतु कम से कम एक घन्टा दूसरे लोगो के साथ वाद-विवाद करना चाहिए । इस वाद-विवाद मे लग गए साल के १५ दिन । अब बच गए ८१ दिन ।
६--हर साल कम से कम ३५ दिन एग्जाम होते है , रह गए ४६ दिन ।
७--क्वाटरली, हाफईयर्ली एवम त्यौहार आदि के नाम पर साल मे चालीस दिन छुट्टिया पड. जाती है, अब रह गए ६ दिन ।
८--लगभग तीन दिन किसीन किसी रूप मेव बीमारी पर खर्च हो जाते है , बचे ३ दिन ।
९--फिल्म देखने व घ्रेलू समारोह आदि पर २ दिन खर्च होते है । बचा मात्र १ दिन ।
और यह एक दिन होता है आपके जान्म दिन के नाम । अन्तत: सारा हिसाब - किताब लगाने के बाद विद्यार्थी के पास पडने के लिए एक दिन भी नही बचता , ऎसे मे उससे पास होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है ......?

Monday, June 23, 2008

शायद ही कोई ऎसा व्यक्ति हो जिसे ’गुलाब’ से लगाव न हो । हर व्यक्ति की यही चाह होती है कि वह अपने घर के आन्गन मे गुलाब की क्यारिया लगाए , क्यारी नही तो गमलो मे ही गुलाब उगाए । गुलाब की सुगन्ध पूरे वातावरण को महका देती है । राष्ट्रपति भवन का मुगल गार्डन आज भी हमे प्राचीन गुलाबो की याद दिलाता है ।
कहते है कि गुलाब की मनमोहक सुगन्ध की दीवानी एक प्रेयसी ने अपने प्रेमी से गुलाब के इत्र की फरमाइश की थी , तभी से इत्र का प्रचलन हुआ। इतिहास गवाह है कि आज से तीन - चार सौ वर्ष पूर्व भी भारत के शाही उद्यान मे गुलाब अपनी सुन्दरता व महक से सभी का मन हर लेता था । शाही घराने मे राजकुमारियो, मलिकाओ , रानियो एवम सुन्दरियो के नहानघर मे गुलाबजल की फुहारे उडाते फव्वारे लगे रहते थे । स्नानकुन्ड मे गुलाबजल के साथ-साथ गुलाब की ताजा पन्खुडिया बिखेरी जाती थी । गुलाब की पन्खुडियो से बना उबटन शाही सुन्दरियो का मुख्य सौन्दर्य प्रसाधन था । फलत: गुलाब वर्षो से सौन्दर्य तथा सज्जा सामग्री के रूप मे तो उपयोगी होता ही रहा है , साथ ही गुलाब औषधीय गुणो की खान भी है ।
-गुलाब मे विटामिन ’सी’ प्रचुर मात्रा मे पाया जाता है । गिलकन्द बनाकर प्रतिदिन सेवन करने से जोडो व हड्डियो मे विशेष शक्ति व लचक बनी रहती है । इससे वॄद्धावस्थामे हड्डी या गठिया जैसे कष्ट्दायक रोगो से बचा जा सकता है ।
-गुलाब के फूल का प्रतिदिन सेवन करने से टी वी रोग से रोगी शीघ्रता से आराम पाता है ।
-गुलाब के फूल की पन्खुडियो से मसूढेव दान्त मजबूत होते है । दान्तो की दुर्गन्ध दूर होती है तथा पायरिया जैसी बीमारी से निजात पाई जा सकती है ।
-पेट की बीमारियो मे गुलाब का गुलकन्द फायदेमन्द होता है ।
- गुलाब आमाशय आन्त और यकॄत की कमजोरी को दूर कर शक्ति का सन्चार करने मे सहायक है ।
-गर्मी के दिनो मे घबराहट,बैचेनी के साथ-साथ जब दिल की धड्कने तेज हो जाती है तब गुलाब को प्रात: चबाकर खाने से आराम मिलता है
-आन्खो मे गर्मी से जलन हो या धूल-मिट्टी से तकलीफ हो तो गूळाबजलसे आन्खे धोनी चाहिए । ’रतौन्धी’नामक नेत्ररोग के लिए गुलाबजल अचूक दवा है ।
-चेचक के रोगी के बिस्तर पर गुलाब की पन्खुडियो का सूखा चूर्ण डालने से दानोके जख्म ठ्न्ड्क पाकर सूख जाते है ।
-गर्मी के दिनो मे गुलाब को पीसकर लेप बनाकर माथे पर लगाने से सिरदर्द थोडी ही देर मे ठीक हो जाता है ।
-गुलाब की पत्तिया पीसकर ,उसके रस को ग्लिसरीनमे मिलाकर सूखे व कटे-फटे होठो पर लगाने से होन्ठ तुरन्त ही चिकने व चमकदार हो जाते है ।
-गर्मियो मे भोजन के बाद पान मे गुलकन्द डलवाकर खाना चाहिए । इससे मुखशुद्धि के साथ-साथ खाना भी हजम हो जाता है ।

मन की शान्ति

आपको पता है की आदमी मन्दिर क्यों जाता है ......
नहीं पता , कोई बात नहीं ... , हम आपको बताते हैं .....
क्योंकि ..........................
वहां आरती होती है
वहां पूजा होती है
वहां अर्चना होती है
वहां उपासना होती है
वहां भावना होती है
वहां महिमा होती है
वहां वंदना होती है
वहां साधना होती है
वहां आराधना होती है
ये सब आदमी को शान्ति देती हैं ........
और इससे उनके मन को मिलती है शान्ति ......