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Thursday, January 1, 2015
Wednesday, June 18, 2014
फ़ैसला
चलो एक फ़ैसला कर लेते हैं ...
आज इस दुनिया को बांट लेते हैं.....
मैं और तुम एक हो जाते हैं ....
बाकी सब दुनियावालों पे छोड़ देते हैं .......
आज इस दुनिया को बांट लेते हैं.....
मैं और तुम एक हो जाते हैं ....
बाकी सब दुनियावालों पे छोड़ देते हैं .......
Saturday, June 14, 2014
महिला आरक्षण विधेयक पर लगी नजरें .......
16
वीं लोकसभा चुनावों में मिली अप्रत्याशित जीत एवम प्रचण्ड बहुमत हासिल कर
भाजपा एवं राजद के नरेंद्र मोदी ने देश के प्रधानमंत्री का पदभार संभाल
लिया है । मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही देश - दुनिया की नजरें उन
पर टिक गई हैं । जनता की अपेक्षाएं भी
बेइंतहा बढ़ गई हैं । इससे अपार जनसमर्थन प्राप्त मोदी सरकार के समक्ष देश
की बागडोर संभालते ही चुनौतियों के पहाड़ खडे़ हो गये हैं । जगजाहिर है कि
आज देश विभिन्न समस्याओं रूपी ज्वालामुखी के ढेर पर बैठा है , हालात
बेकाबू हो गये हैं । जिनसे जुझने के लिये मोदी सरकार को अपनी सूझबूझ की
रणनीति से ठोस कदम उठाने होंगे ।
यूं
तो चुनावों के दौरान सभी राजनीतिक दलों ने अपने - अपने चुनावी घोषणा
पत्र में तमाम वायदे किये थे । भाजपा एवं राजद के नेतृत्व वाली मोदी सरकार
ने भी तमाम वादे किये हैं , उनमें से यहां हम बात करेंगे महिलाओं से जुडे़
वादों की -----
भाजपा ने अपने पत्र में महिलाओं की
सुरक्षा और
कल्याण के साथ - साथ संसद और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का कानून बनाए जाने पर अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की है ।
अब देखना यह है कि जिस महिला आरक्षण बिल [ नारी सशक्तीकरण का प्रतीक ] को
पारित कर अमल में लाने का प्रयास पिछले 17 सालों से चल रहा है , पिछली
यूपीए सरकार तमाम कोशिशों के बावजूद किन्हीं राजनीतिक दलों के विरोध और
दांवपेचों के चलते
लोकसभा में पारित नहीं कर पाई ,उसे मोदी सरकार कितने समय में पारित करवा
पायेगी ।ऎसा करके वह महिलाओं कि उम्मीदों पर खरा उतर पायेगी या नहीं ।
क्या है महिला आरक्षण विधेयक -----
आजादी
के बाद महिलाओं की
बेहतरी और सत्ता में उन्हें हिस्सा देने की गरज से पिछले 18 वर्षों से
संविधान के 108 वें महिला सशोधन विधेयक को लाने का प्रयास किया गया है। इस
बिल के लागू होने से भारतीय राजनीति पटल का दृश्य ही बदल जायेगा क्योंकि
इसके तहत भारतीय संसद में महिलाओं की भागीदारी 33 प्रतिशत आरक्षित हो
जायेगी । फ़लस्वरूप भारतीय संसद में 248 और राज्य विधानसभाओं में 1223
महिलाएं आ जाएंगी , जिससे पुरुषों का
वर्चस्व खत्म हो जायेगा । 543 सदस्यों वाली लोक्सभा में अभी तक महिला
सांसदों की संख्या 61 से ऊपर नहीं पहुंची है तो राज्य विधानसभाओं में भी
हालात कुछ अच्छे नहीं , यहां भी 4072 विधानसभाओं में महिला सदस्यों का
आंकडा़ 300 तक ही पहुंच पाया है । जाहिर है इस बिल के आने से पुरुषों की
संख्या सीमित हो जायेगी और महिलाओं की संख्या बढ़ जायेगी ।
देश
की पहली लोकसभा में महिला सांसदों का प्रतिशत महज चार फ़ीसदी थी और आज भी
यह आंकडा़ कुछ खास आगे नहीं बढा़ है । हाल ही में गठित 16वीं लोकसभा में भी
मात्र 61 महिलाएं [अब तक की सबसे ज्यादा संख्या ] चुनकर आई हैं जो मात्र
11 फ़ीसदी ही हैं । अत: यह तय है कि इस विधेयक के लागू होने से भारतीय संसद
में महिलाओं की संख्या बढ़ने
से कोई नहीं
रोक पायेगा ।
संसदीय व्यवस्था में महिलाएं----
देखा
जाए तो भारत ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी
महिलाओं की स्थिति अच्छी नहीं है । विश्व की आधी
आबादी होने के बावजूद समूची संसदीय प्रणाली में महिलाओं
की भागीदारी सिर्फ़ 18.4 ही फ़ीसदी है ।
जबकि दुनिया में संसदीय प्रणाली वाले देशों की संख्या 187 है । इनमें से
केवल 63 में द्विसदनीय व्यवस्था है , इनमें से भी महज 32 देशों में ही
महिलाओं को वहां की संसद या उसके किसी सदन का अध्यक्ष बनने का अधिकार मिल
सका है । इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन के मुताबिक 30 अप्रैल 2009 तक के
आंकडो़ के अनुसार संसदीय व्यवस्था वाले देशों में सांसदों की कुल संख्या 44
हजार 113 थी ,इनमें महिला
सांसदों की संख्या महज 8 हजार 112 थी । कुलमिलाकर देखा जाए तो महिलाओं की
दयनीय तस्वीर ही सामने आती है । दुनिया की एक चौथाई संसदों में तो महिलाओं
की संख्या नगण्य है । सऊदी अरब में तो महिलाओं को वोट डालने का भी अधिकार
नहीं है ।
लोकतंत्र
के सबसे बडे़
पैरोकार और
मानवाधिकारों का
ठेकेदार बनने वाले अमेरिका में कांग्रेस के दोनों सदनों - सीनेट और
प्रतिनिधि सभा में सर्वाधिक 17.17 महिला सांसद ही चुनी गई । संसद में
महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के
मामले में भारत दुनिया में 134वें स्थान पर है।
देश मे आधी आबादी (महिलाएं) पिछले एक दशक से अपना प्रतिनिधित्व बढाने की मांग कर
रही हैं लेकिन पुरूष प्रधान राजनीति संसद में महिला आरक्षण विधेयक पारित नहीं होने
दे रही। अधिकांश पुरूष सांसद महिला सशक्तिकरण की बात जरूर करते हैं, पर
समाज की "आधी आबादी" के लिए त्याग करने के लिए तैयार नहीं हैं। इस मुद्दे पर
राजनीतिक दलों की कथनी और करनी में अंतर दिखता है।
महिला आरक्षण की आवश्यकता ------
महिलाओं के उत्थान के लिए यह विधेयक आवश्यक है। लेकिन
इसमें भी
संशय है कि यह सिर्फ आम बिल बनकर रह जाए या महिलाओं को हक दिलाने में कारगर भी
होगा।फ़िर भी इस बिल के पेश होने के बाद उम्मीद है कि महिलाएं आत्मविश्वास के साथ अपने
हक की मांग करें। अपने अधिकारों को कानूनी रूप से प्राप्त करने के लिए वे स्वयं आगे
आएं। कितने आश्चर्य की बात है कि इतने चुनावों के बाद भी महिलाओं की सत्ता में
भागीदारी नगण्य है ।
स्त्री
जब भी अपने अधिकार के लिए आगे आती है, तो उसे वह स्थान
नहीं मिलता। वह चाहे राजनीतिक पार्टियों के टिकटों के बंटवारे का मामला हो
या फिर
नौकरी में आरक्षण का। किसी महिला को महत्वपूर्ण जगह मिल भी गई, तो उसे
पुरुषवादी
मानसिकता का चतुर्दिक सामना करना पड़ता है। उसे उसी पद्धति के भीतर रहना
पड़ता है। वह
अपनी आवाज उठाती है, तो उसे महत्वपर्ण जगह से हटा दिया जाता है। किरण बेदी
के साथ
भी तो यही हुआ। यह स्थिति तब तक बनी रहेगी, जब तक समाज के नजरिये में फर्क
नहीं
आएगा। समाज का मौजूदा नजरिया तो स्त्रियों को बर्दाश्त न करने वाला है।
समाज की मानसिकता बदलने की जरूरत है। समाज को बदलने की पहल भी
महिलाओं को ही करनी होगी। महिलाओं को शिक्षित होना पड़ेगा।
कानून हमारे यहां हैं, लेकिन उनकी परिणति
क्या होती है? बलात्कार जैसे जघन्य अपराध की एफआईआर तक को प्राथमिकता नहीं दी जाती।
सच कहें, तो स्त्री को अधिकार मिलने में कानून, कागज और कार्रवाई के बीच बड़े अंतराल
हैं। इन अंतरालों को हमें पाटना पड़ेगा। कोई कानून तभी प्रभावी होता है, जब सदिच्छा
से उसे लागू किया जाए।
लबे समय से बहस में अटका है ये बिल -------
इस
बात का खेद है कि पुरुष दोहरी मानसिकता के शिकार आज भी हैं । जिसके कारण
महिलाओं के लिये विधायिका में 33 प्रतिशत स्थान
आरक्षित करने का मुद्दा महज ख्यालों
में ही
अटक गया है । विभिन्न राजनीतिक दलों में ही इसे लेकर जबर्दस्त अंतर्विरोध
है । इसके समर्थन और विरोध में अलग - अलग तर्क हैं । समर्थकों का मानना है
कि विधायिका में महिलाओं का आरक्षण होने से देश की राजनीति में महिलाओं की
संख्या बढे़गी तथा सामाजिक समर्थन का सपना भी साकार हो जायेगा । जबकि
विरोधियों का मानना है कि इसके स्वरूप से सिर्फ़ उच्च वर्ग की महिलाओं को ही
फ़ायदा पहुंचेगा ।
इसलिये ये लोग आरक्षण के भीतर अलग कोटे की मांग कर रहे हैं । जदयू अध्यक्ष
शरद यादव , समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और राजद अध्यक्ष
लालू प्रसाद यादव आरक्षण के मौजूदा स्वरूप के हक में नहीं हैं । यही नहीं
वर्तमान में भाजपा से सांसद चुनकर आई उमा भारतीभी आरक्षण के इस स्वरूप के
विरोध में थीं , अब उनका रुख क्या होगा यह देखना महत्पूर्ण है ।
यह बिल, जो कि देश के चौथे प्रधानमंत्री राजीव गांधी का स्वप्न था , संसद में पहली बार 12 सितंबर 1996 को एच डी देवगौडा़ सरकार के समय लोकसभा में पेश किया गया । लेकिन उस वक्त भी इसके पक्ष - विपक्ष में बेहद शोर - शराबा हुआ और विधेयक अधर में लटक गया । इसके बाद अटल बिहारी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन [ एनडीए ] सरकार द्वारा 1998 में दोबारा पेश किया गया लेकिन 12 वीं लोकसभा के भंग होने से यह बिल फ़िर अटक गया । राजनैतिक दलों में आम सहमति न होने के कारण 23दिसंबर 1999 को तीसरी बार पेश किया गया यह बिल फ़िर पारित न हो सका । बार - बार पटरी से उतरता हुआ यह बिल किसी टेडी़ खीर से कम नहीं लगने लगा । तत्पश्चात डा. मनमोहन सिंह की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन [ यूपीए ] सरकार जब 2004 में सत्ता में आई तो उसने इस विधेयक को न्यूनतम साझा कार्यक्रम का हिस्सा बनाया और 2008 में यह विधेयक प्रस्तुत किया । लेकिन इस बार भी आरक्षण को लेकर राजनीतिक खेल खेले ।
ऎतिहासिक फैसला ---------
आखिरकार 14 साल की लम्बी जद्दोजहद के बाद आरक्षण बिल मार्च 2010 में राज्यसभा में लाया गया और भारी मतभेदों व ना - नुकुर के चलते यह पास हो गया । इस तरह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया और महिलाओं के हक में एक नई क्रांति की शुरुआत हुई।
विधेयक के रास्ते में बाधाएं --------
केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में पास करवाकर अवश्य ही अपने इरादे जता दिये हैं । सरकार की इस जीत के लिये सत्ता के साथ साथ विपक्षी दल भी बराबर के हकदार है ।किंतु आम सहमति ना बन पाने के कारण सरकार इसे लोकसभा के पटल पर नहीं रख पाई ।
यह बिल, जो कि देश के चौथे प्रधानमंत्री राजीव गांधी का स्वप्न था , संसद में पहली बार 12 सितंबर 1996 को एच डी देवगौडा़ सरकार के समय लोकसभा में पेश किया गया । लेकिन उस वक्त भी इसके पक्ष - विपक्ष में बेहद शोर - शराबा हुआ और विधेयक अधर में लटक गया । इसके बाद अटल बिहारी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन [ एनडीए ] सरकार द्वारा 1998 में दोबारा पेश किया गया लेकिन 12 वीं लोकसभा के भंग होने से यह बिल फ़िर अटक गया । राजनैतिक दलों में आम सहमति न होने के कारण 23दिसंबर 1999 को तीसरी बार पेश किया गया यह बिल फ़िर पारित न हो सका । बार - बार पटरी से उतरता हुआ यह बिल किसी टेडी़ खीर से कम नहीं लगने लगा । तत्पश्चात डा. मनमोहन सिंह की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन [ यूपीए ] सरकार जब 2004 में सत्ता में आई तो उसने इस विधेयक को न्यूनतम साझा कार्यक्रम का हिस्सा बनाया और 2008 में यह विधेयक प्रस्तुत किया । लेकिन इस बार भी आरक्षण को लेकर राजनीतिक खेल खेले ।
ऎतिहासिक फैसला ---------
आखिरकार 14 साल की लम्बी जद्दोजहद के बाद आरक्षण बिल मार्च 2010 में राज्यसभा में लाया गया और भारी मतभेदों व ना - नुकुर के चलते यह पास हो गया । इस तरह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया और महिलाओं के हक में एक नई क्रांति की शुरुआत हुई।
विधेयक के रास्ते में बाधाएं --------
केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में पास करवाकर अवश्य ही अपने इरादे जता दिये हैं । सरकार की इस जीत के लिये सत्ता के साथ साथ विपक्षी दल भी बराबर के हकदार है ।किंतु आम सहमति ना बन पाने के कारण सरकार इसे लोकसभा के पटल पर नहीं रख पाई ।
वर्तमान राजनीतिक समीकरण में रोचक तथ्य यह है कि संप्रग के समर्थन में राजग प्रमुख
भाजपा अपना समर्थन लिए खड़ी है। वामदल भी आरक्षण विधेयक के समर्थक हैं। राजद,
द्रमुक, पीएमके दलित, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए भी आरक्षण चाहता है।
सपा भी कोटे में कोटे की पक्षधर है। इस विधेयक के रास्ते में कई तकनीकी परेशानियाँ
हैं क्योंकि यह संविधान में संशोधन करने वाला विधेयक है. ग्यारहवीं लोकसभा में पहली
बार विधेयक पेश हुआ था तो उस समय उसकी प्रतियां फाड़ी गई थीं. इसके बाद 13वीं लोकसभा
में भी तीन बार विधेयक पेश करने का प्रयास हुआ, लेकिन हर बार हंगामे और विरोध के
कारण ये पेश नहीं हो सका था. महिला आरक्षण विधेयक एक संविधान संशोधन विधेयक है और
इसलिए इसे दो तिहाई बहुमत से पारित किया जाना ज़रूरी है.
नई गठित मोदी सरकार पर उम्मीदें टिकीं --------नरेन्द्र मोदी की छवि एक आक्रामक नेता के रूप में रही है । हरेक नागरिक की बेहतरी की ख्वाहिश रखने वाले मोदी सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखते हैं । देश के नये प्रधानमंत्री से लोगों ने काफ़ी उम्मीदे लगाई हुई हैं वहीं देश की महिलाएं भी उम्मीद कर रही हैं कि मोदी सरकार उनकी सुरक्षा व्यवस्था के अलावा महिलाओं को बराबर की भागीदारी दिलाने वाला महिला आरक्षण विधेयक को पारित कर पास करवाने की दिशा में ठोस कदम उठाएं । उल्लेखनीय है कि पिछले 18 सालों से दूसरी सरकारें इस विधेयक को लाने के लिये प्रयास तो कर रही हैं मगर कुछ राजनीतिक दलों के दोहरे रवैये के कारण आज तक ये विधेयक अधर में लटका हुआ है ।
Tuesday, May 13, 2014
ऎग्जिट पोल पर विश्वास नहीं .....
अगर आज कोई मुझसे पूछे कि मैंने किस पार्टी को वोट दिया है तो मैं इस बात का खुलासा हर्गिज नहीं करूंगी कि मैंने किसे वोट दिया है ...इसलिये मैं नहीं समझती कि दूसरे लोग भी अपने वोट का खुलासा करने के हक में होंगे ...और यदि ऐसा है तो एग्जिट पोल के सर्वे विश्वास करने के काबिल नहीं हैं .............
लेबल:
राजनीतिक
Tuesday, May 6, 2014
अंधविश्वास के चक्कर में ना पडे़ं ..........
आजकल सोशल नेटवर्किंग साइट फ़ेसबुक के साथ - साथ मोबाइल एप्स के माध्यम से आने वाले मैसेजेस में एक अजीब रिवाज चल पडा़ है । जिसके तहत देवी - देवताओं की तस्वीर चस्पा कर उसमें लिखा जा रहा है कि इसे देखकर तुरत लाईक करो या इस मैसेज को कम से कम 9 - 10 लोगों को भेजो । इससे तुम्हारे मन की मुराद पूरी होगी और यदि ऐसा नही किया तो तुम्हे कोई बुरी खबर मिलेगी या बदकिस्मत हो जाओगे ।
बडे हैरत की बात है कि कुछ लोग ऐसी हरकतें करके अंधविश्वास फैलाने में लगे हैं और हम लोग बडी़ आसानी से उनके झांसे में आकर अपनी सूझबूझ खोकर ऐसी फोटोज को लाइक कर आगे भेज रहे हैं । ये भी नही सोचते कि क्या ऐसे मैसेजेस भेजने या लाइक करने से कभी किसी की मन्नत पूरी हुई है जो अब तुम्हारी होगी ? जबकि ऐसे मैसेजेस सिवाय उलझन ही पैदा करते हैं । साथ ही ये मैसेजेस टेंशन देने के अलावा अंधविशवास को भी फैलाते हैं ।
अत: फ़ेसबुक यूजर्स और मोबाइल यूजर्स सावधान रहें और बिना किसी डर के तथा अंधविश्सवास में पडे ऐसे मैसेजेस को डिलीट करें । और भेजने वालों से गुजारिश है कि वे अजीबोगरीब हरकतें करना बंद करें और अपने कर्म पर ध्यान दें । क्योंकि आपके साथ अच्छा या बुरा जो भी होता है वो सब आपके कर्मो से ही तय होता है । ज्यादा कुछ नहीं तो दूसरे लोगों को शांति से जीने दें ।
बडे हैरत की बात है कि कुछ लोग ऐसी हरकतें करके अंधविश्वास फैलाने में लगे हैं और हम लोग बडी़ आसानी से उनके झांसे में आकर अपनी सूझबूझ खोकर ऐसी फोटोज को लाइक कर आगे भेज रहे हैं । ये भी नही सोचते कि क्या ऐसे मैसेजेस भेजने या लाइक करने से कभी किसी की मन्नत पूरी हुई है जो अब तुम्हारी होगी ? जबकि ऐसे मैसेजेस सिवाय उलझन ही पैदा करते हैं । साथ ही ये मैसेजेस टेंशन देने के अलावा अंधविशवास को भी फैलाते हैं ।
अत: फ़ेसबुक यूजर्स और मोबाइल यूजर्स सावधान रहें और बिना किसी डर के तथा अंधविश्सवास में पडे ऐसे मैसेजेस को डिलीट करें । और भेजने वालों से गुजारिश है कि वे अजीबोगरीब हरकतें करना बंद करें और अपने कर्म पर ध्यान दें । क्योंकि आपके साथ अच्छा या बुरा जो भी होता है वो सब आपके कर्मो से ही तय होता है । ज्यादा कुछ नहीं तो दूसरे लोगों को शांति से जीने दें ।
लेबल:
सामाजिक
Monday, May 5, 2014
३० मई को रिलीज़ हो रही है फिल्म बाबा रामसा पीर
३० मई को रिलीज़ हो रही है फिल्म “बाबा रामसा पीर’. राजस्थान के जाने माने संत ‘बाबा रामसा पीर’ की इस फिल्म का निर्माण किया है औशिम खेत्रपाल ने. जिन्होंने इस फिल्म से पहले “शिरडी साईं बाबा” नामक फिल्म बनाई थी. अभिनेता औशिम खेत्रपाल ऐतिहासिक फिल्म “बाबा रामसा पीर” में बाबा के चरित्र को अभिनीत कर रहे हैं. इस फिल्म से पहले इन्होने फिल्म ‘शिरडी साईं बाबा’ में भी अभिनय किया था.
१४ शताब्दी में एक
संत थे जिनका नाम रामसा था जिन्होंने सबसे पहले हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश
फैलाया जिन्हें हिंदू बाबा और मुसलमान पीर कहते थे और दोनों ही इनकी पूजा करते थे.
यह नाम बाबा को फारस के इनके ५ साथियों ने ही दिया था जो की उस समय भारत आये थे.
इन्हीं “बाबा रामसा पीर” की कहानी पर आधारित है यह फिल्म, जिसका निर्माण हुआ है
सतीश टंडन प्रोडक्शन एंड ओरिएंट ट्रेडलिंक
लिमिटेड के बैनर में.
इस फिल्म में अभिनय किया है साईं भक्त के रूप में विश्व में प्रसिद्ध औशिम खेत्रपाल
और अभिनेत्री ग्रेसी सिंह ने. फिल्म की शूटिंग हुई है मुंबई, जोधपुर, जयपुर और
रोंचा गाँव जहाँ पर बाबा रामसा की समाधि है. यह फिल्म राजस्थानी और हिंदी आदि दो
भाषाओ में बनी है. इस फिल्म में हिंदी, राजस्थानी भाषा के साथ-साथ गुजराती भाषा
में भी मधुर गीत संगीत है जो कि निश्चित रूप से श्रोताओ को पंसद आएगा.
३० मई को रिलीज़ हो रही है फिल्म
बाबा रामसा पीर
३०
मई को रिलीज़ हो
रही है फिल्म “बाबा रामसा पीर’. राजस्थान के जाने माने संत ‘बाबा रामसा
पीर’ की इस
फिल्म का निर्माण किया है औशिम खेत्रपाल ने. जिन्होंने इस फिल्म से पहले
“शिरडी साईं बाबा” नामक फिल्म बनाई थी. अभिनेता औशिम खेत्रपाल
ऐतिहासिक फिल्म “बाबा रामसा पीर” में बाबा के चरित्र को अभिनीत कर रहे हैं.
इस
फिल्म से पहले इन्होने फिल्म ‘शिरडी साईं बाबा’ में भी अभिनय किया था.
१४ शताब्दी में एक
संत थे जिनका नाम रामसा था जिन्होंने सबसे पहले हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश
फैलाया जिन्हें हिंदू बाबा और मुसलमान पीर कहते थे और दोनों ही इनकी पूजा करते थे.
यह नाम बाबा को फारस के इनके ५ साथियों ने ही दिया था जो की उस समय भारत आये थे.
इन्हीं “बाबा रामसा पीर” की कहानी पर आधारित है यह फिल्म, जिसका निर्माण हुआ है
सतीश टंडन प्रोडक्शन एंड ओरिएंट ट्रेडलिंक
लिमिटेड के बैनर में.
इस फिल्म में अभिनय किया है साईं भक्त के रूप में विश्व में प्रसिद्ध औशिम खेत्रपाल
और अभिनेत्री ग्रेसी सिंह ने. फिल्म की शूटिंग हुई है मुंबई, जोधपुर, जयपुर और
रोंचा गाँव जहाँ पर बाबा रामसा की समाधि है. यह फिल्म राजस्थानी और हिंदी आदि दो
भाषाओ में बनी है. इस फिल्म में हिंदी, राजस्थानी भाषा के साथ-साथ गुजराती भाषा
में भी मधुर गीत संगीत है जो कि निश्चित रूप से श्रोताओ को पंसद आएगा.Saturday, September 21, 2013
ये तीन चीजें ---सोचो , समझो और पढो़ .....
तीन चीजें जिंदगी में एक बार मिलती हैं .....
-मां - बाप
वक्त
दोस्त
ये तीन चीजें समझकर उठाओ ----
कदम
कसम
कलम
ये तीन चीजें सोच कर करो ------
प्यार
बात
फैसला
ये ती चीजें किसी का इंतजार नहीं करती ----
मौत
वक्त
उमर
ये तीन चीजें छोटी न समझो ----
कर्ज
फर्ज
रिश्ता
ये तीन चीजें हमेशा दर्द देती है -----
धोखा
गरीबी
यादें
इन तीन चीजों से हमेशा आप खुश रहेंगे -------
गॉड
फेमिली
दोस्ती
है ना तीन चीजो का मतलब .......
-मां - बाप
वक्त
दोस्त
ये तीन चीजें समझकर उठाओ ----
कदम
कसम
कलम
ये तीन चीजें सोच कर करो ------
प्यार
बात
फैसला
ये ती चीजें किसी का इंतजार नहीं करती ----
मौत
वक्त
उमर
ये तीन चीजें छोटी न समझो ----
कर्ज
फर्ज
रिश्ता
ये तीन चीजें हमेशा दर्द देती है -----
धोखा
गरीबी
यादें
इन तीन चीजों से हमेशा आप खुश रहेंगे -------
गॉड
फेमिली
दोस्ती
है ना तीन चीजो का मतलब .......
Monday, July 8, 2013
Wednesday, July 4, 2012
लोकतंत्र से देश को खतरा : सुरेन्दर शर्मा
आज इस देश में लोकतंत्र को कोई खतरा नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की वजह से देश को खतरा है. जाने माने हास्य कवि सुरेंदर शर्मा ने आज के राजनीतिक हालात और नेताओं पर अपनी जानी पहचानी चुटीली शैली में व्यंग बाण छोड़े। शर्मा पीतमपुरा स्थित गुरू गोविंद सिंह कॉलेज में भिवानी मैत्री परिवार की तरफ से आयोजित मधुप जयंती समारोह के मौके पर हास्य कवि सम्मेलन में त्रोताओं को ना केवल जमकर हंसाया बल्कि सोचने पर भी मजबूर किया। कवि सम्मेलन में डा गोविंद व्यास, कुंवर बैचेन, गजेन्द्र सोलंकी, राजेंद्र कलकल और अनिल अग्रवंशी ने भी अपनी रचनाओं से लोगों का खासा मनोरंजन किया।पंजाब केसरी के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार अश्विनी चोपड़ा इस कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि मौजूद थे. उन्होंने मधुपजी
साहित्य की भूरी भूरी प्रशंसा करते हुए लोगों को इसे गंभीरता से पढने की अपील की. श्री चोपड़ा ने भिवानी
परिवार मैत्री संघ द्वारा किये जा रहे जनहित के कार्यों की भी सराहना की.
भिवानी परिवार मैत्री संघ के संरक्षक सुधाकर गुप्ता के मुताबिक मधुप जयंती समारोह का आयोजन भिवानी के मूल निवासी और हरियाणा के जाने माने कवि महाबीर प्रसाद मधुप की याद में किया जाता है। कार्यक्रम में मधुप के गजल संग्रह कारवां उम्मीद का का विमोचन किया गया. जबकि साहित्य में खास योगदान के लिए हरियाणा साहित्य अकादमी के सचिव माधव कौशिक को मधुप काव्य सम्मान से नवाजा गया। श्री माधव कौशिक और श्री अश्विनी चोपड़ा ने भिवानी परिवार मैत्री संघ को हर संभव मदद देने का वादा किया . दोनों ने ही मधुप जी की याद में शुरू किये गए किसी भी कार्य में पूरा सहयाग करने का भी भरोसा दिलाया. समारोह का आयोजन श्रीमती सरबती देवी गुप्ता के सान्निध्य में किया गया. इस कार्यक्रम में शिक्षाविद और विद्या भारती के महासचिव नरेंद्र जीत सिंह रावल , एस्कॉर्टस अस्पताल के निदेशक डा़ सुमन भंडारी, राष्ट्रीय कवि संगम के अध्यक्ष जगदीश मित्तल, समाजसेवी कुसुमाकर गुप्ता, तुगलकाबाद ट्रेडर्स एसोसिअशन के अध्यक्ष ओपी गोयल, बीजेपी नेता महेंद्र चावला,ठाकुर विक्रम सिंह, निगम पार्षद अरविंद गर्ग लायंस क्लब के गवर्नर सुरेश गुप्ता, अग्रवाल मूवर्स एण्ड पैकर्स के रमेश अग्रवाल,व्यवसायी सुदर्शन जैन , समाजसेवी सतीश गुप्ता, न्यूज एक्प्रैक्स चैनल के दिल्ली एनसीआर प्रमुख अतुल सिंघल समेत कई गणमान्य लोग उपस्थित थे। बीपीएमएस के महासचिव अरविन्द गर्ग ने उपस्थित लोगों को संस्था के काम काज की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि भिवानी परिवार मैत्री संघ हरियाणा के भिवानी जिले के मूल निवासियों के उन परिवारों का समूह है जो दिल्ली और आस पास के इलाकों में रहते हैं. श्री गर्ग के मुताबिक संघ आजकल अपने सदस्यों को दिल्ली में एक अदद छत मुहैया करवाने के लिए एक आवासीय परियोजना पर काम कर रहा है. इसके अलावा सद्स्यों की एक डायरेक्ट्री के प्रकाशन का काम भी चल रहा है. जबकि अंतर्राष्ट्रीय कवि और भिवानी परिवार मैत्री संघ के अध्यक्ष राजेश चेतन ने खूबसूरत मंच संचालन किया. चेतन ने समारोह को सफल बनाने के लिए अपने कोषाध्यक्ष जगदीश गोयल , कार्यकारिणी सदस्यों प्रमोद शर्मा, दिनेश गुप्ता, सुभाष गर्ग, राजीव गुप्ता, अशोक भारद्वाज, सुशील गनोत्रा, सुरेश अग्रवाल,पवन मोड़ा, अनिल सर्राफ, राजेन्द्र जालान, राजकुमार अग्रवाल और संरक्षक सत्य नारायण गुप्ता का धन्यवाद किया. चेतन ने बताया कि हमारी माटी हमारी विरासत बीपीएमएस का मूल मन्त्र है. इसलिए संस्था समाज की भलाई के काम करती रहेगी.
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