नई दुनिया में छ्पी फोटो देखें------------
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Wednesday, October 20, 2010
आखिर कब सुधरेंगे हम ?
बड़े शर्म की बात है कि आए दिन सचेत करते रहने के बाद भी हम लोगों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी है । इसी का प्रत्यक्ष प्रमाण बयां कर रही है आज नई दुनिया अखबार में ”आस्था का कचरा” नाम से प्रकाशित फोटो ।यूं तो फोटो को देखकर कुछ कहने की जरूरत नहीं है , फोटो मैली होती यमुना की कहनी खुद ब खुद कह रही है ।
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Wednesday, October 13, 2010
एक नजर : तस्वीरों में कैद मध्य प्रदेश पर
यूं तो आपने समूचा मध्य प्रदेश घूमा होगा लेकिन फिर आज यहां तस्वीरों के माध्यम से आपको मध्य प्रदेश घुमाने का प्रयास कर रही हूं ..............
बाज बहादुर का पैलेस , मांडु

गौहर महल
इंदौर
भगवान पशुपतिनाथ , मंदसौर
खजुराहो
खजुराहो मंदिर
मांडु
ओरछा
पांड्वों की गुफा
रजवाड़ा पैलेस
ताज - उल - मस्जिद
बाज बहादुर का पैलेस , मांडु
भीमबेटका केव पेंटिंग

गौहर महल
इंदौर
भगवान पशुपतिनाथ , मंदसौर
खजुराहो
खजुराहो मंदिर
मांडु
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पांड्वों की गुफा
रजवाड़ा पैलेस
ताज - उल - मस्जिद
Monday, October 11, 2010
विश्व का सबसे बड़ा मानव मुस्कान चेहरा
ये दुनिया भी कितनी रंगबिरंगी , अजीबोगरीब व विचित्र किस्म की है समझ से परे है । अब वो चाहे हमारे देश भारत की बात हो या अन्य किसी देश - विदेश की , लोग आए दिन ऎसे - ऎसे कारनामे कर दिखाते हैं कि उनकी कारगुजारी , हिम्मत , बहादुरी और जज्बे को देखकर खुद - बखुद ही उनके लिए मुख से प्रशंसनीय शब्द निकलते हैं । लोगों के द्वारा कुछ नया व विचित्र करने का कारनामा पिछले दिनों देखने को मिला ।
ऑरलैंडो में लगभग पांच सौ लोगों ने मिलकर विश्व का सबसे बड़ा मानव मुस्कान चेहरा बनाया । पिछली एक अक्टूबर को ऑरलैंडो में विश्व मुस्कान दिवस समारोह मनाया गया जिसमें सैकड़ों लोगों ने भाग लेकर मुस्कराता चेहरा बनाया । मगर पांच सौ लोगों की टुकड़ी ने सबसे अलग पीले और काले गाउन पहनकर कंधे से कंधा मिलाकर लगभग दस मिनट तक खड़े रहकर यह मुस्कराता मानव चेहरा बनाया । विश्व मुस्कुराओ खोज अभियान के तहत इसी मानव स्माइली चेहरे को दुनिया के सबसे बड़े स्माइली चेहरे के रूप में स्वीकार किया गया । उम्मीद की जा सकती है कि इस मानव मुस्कान चेहरे को गिनीज बुक में जगह मिल सके ।
ऑरलैंडो में लगभग पांच सौ लोगों ने मिलकर विश्व का सबसे बड़ा मानव मुस्कान चेहरा बनाया । पिछली एक अक्टूबर को ऑरलैंडो में विश्व मुस्कान दिवस समारोह मनाया गया जिसमें सैकड़ों लोगों ने भाग लेकर मुस्कराता चेहरा बनाया । मगर पांच सौ लोगों की टुकड़ी ने सबसे अलग पीले और काले गाउन पहनकर कंधे से कंधा मिलाकर लगभग दस मिनट तक खड़े रहकर यह मुस्कराता मानव चेहरा बनाया । विश्व मुस्कुराओ खोज अभियान के तहत इसी मानव स्माइली चेहरे को दुनिया के सबसे बड़े स्माइली चेहरे के रूप में स्वीकार किया गया । उम्मीद की जा सकती है कि इस मानव मुस्कान चेहरे को गिनीज बुक में जगह मिल सके ।
Sunday, October 10, 2010
खुद ही चुनें अपने लिए बाथ......................................
आज जीवन के समीकरण इतने बदल गए हैं कि वे कहां जाकर रुकेंगे कुछ पता नहीं । भागमभाग वाली जिंदगी में अपने घर पर ज्यादा समय नहीं दे पाते लेकिन जो भी समय देते हैं उसे बड़े ही कूल वातावरण में बिताने का प्रयास रहता है । अब चूंकि कूल वातावरण चाहिए तो घर की साजोसज्जा भी कूल बनानी पड़ेगी सो आज हर कोई अपने घर को उसी हिसाब से डिजायन करने लगा है । लिविंग एरिया ऎसा होना चाहिए तो बेडरूम वैसा ,माड्यूलर किचिन के तो कहने ही क्या । अब बारी है बाथरूम की सो यह भी हर मायने में कूल ही होना चाहिए। यहां बाथरूम के कुछ डिजायन दिए जा रहे हैं जिसमें से अपने लिए बाथरूम आप खुद ही चुन लें..........
Thursday, October 7, 2010
तातारपुर : ले आइये रावण के पुतले
हर साल की तरह इस साल भी असत्य पर सत्य की विजय के प्रतीक रूप ’रावण दहन’ की तैयारियां जोर - शोर से चल रही हैं । कॉमन्वेल्थ गेम्स के चलते हर कोई इसी कश्मकश में था कि रावण दहन हो सकेगा या नहीं , रामलीला मंचन का क्या स्वरूप रहेगा ? लेकिन आज असमंजस के सभी बादल छंट गये हैं । एक ओर समूचा देश कॉमन्वेल्थ गेम्स की बयार में बह रहा है वहीं रामलीलाओं का मंचन भी अपनी पूरी भव्यता से चल रहा है । इन्हीं सब गतिविधियों के चलते हुए दिल्ली की एक छोटी सी बस्ती तातारपुर पूरी तरह रावण के रंग में रंग गई है । यहां रावण के पुतले बनाने वाले कामगारों ने अपने काम में तेजी ला दी है और वे दिन रात लगकर रावण के पुतले तैयार करने में जुट गए हैं ।
दिल्ली के राजागार्डन के पास स्थित तातारपुर बस्ती रावण के पुतलों की मंडी के नाम से मशहूर है । दिन - प्रतिदिन बढ़ती रामलीलाओं की संख्याओं के चलते पिछले पचास वर्षों से चला आ रहा यह व्यवसाय आज खूब फल - फूल रहा है । कभी एक व्यक्ति द्वारा शुरू किए गए इस व्यवसाय मे दर्जनों लोग लग गए हैं यही वजह है कि इस क्षेत्र ने मंडी का रूप ले लिया है ।
तातारपुर मंडी दिल्ली में ही नहीं बल्कि देशभर में ऎकमात्र ऎसी मंडी है जहां हर साल सैकड़ों की संख्या में रावण के पुतले तैयार होते हैं । ये पुतले दिल्ली व देश के विभिन्न राज्यों तथा क्षेत्रों के अलावा विदेशी धरती पर भी अपनी धूम मचाते हैं । यहां रावण के अलावा मेघनाद तथा कुंभकर्ण के भी पुतले बड़ी मात्रा में तैयार किए जाते हैं । इस क्षेत्र में नजर डालने पर ऎसा लगता है मानो हां रावण परिवार का मेला लगा हुआ हो । पुतले बनाने में मशगूल एक दुकानदार महेन्द्रपाल ने बताया कि वे दस फुट से लेकर चालीस - पचास फुट तक के पुतले तैयार करते हैं ।आमतौर पर वे दस से बीस फीट तक के पुतले तैयार करते हैं जबकि तीस से पचास फीट के पुतले आर्डर पर ही तैयार करते हैं । क्योंकि इनमें लागत ज्यादा आती है तथा इनके गिरने का खतरा भी बना रहता है । राजेन्द्र बताते हैं कि पुतले बनाने का काम काफी जोखिम भरा भी है , क्योंकि यह जरूरी नहीं कि हमने जितने पुतले तैयार किए हैं वे सभी बिक जाएं । कभी - कभी तो सारे निकल जाते हैं और ग्राहकों कि डिमांड पूरी नहीं हो पाती है । कभी जो तैयार हैं वे भी नहीं निकल पाते । जिसका हर्जाना पुतला बनाने वाले को ही भुगतना पड़ता है । ये चीज ऎसी नहीं है कि नहीं बिक सकी है तो बाद में काम आ जाएगी । दशहरे के बाद इन पुतलों को पूछने वाला कोई नहीं होता । इसलिए वे बहुत ही डर - डर के पुतले तैयार करते हैं ।
राजेन्द्र ने बताया कि इस बार तो स्थिति काफी विकट थी क्योंकि कॉमनवेल्थ गेम्स के कारण वे लोग यह तय नहीं कर पा रहे थे कि पुतले बनाए या नहीं और यदि बनाएं तो कितने ? लेकिन हालात अच्छे ही नजर आ रहे हैं । उन्हें उम्मीद है कि संभवत: विदेशी मेहमान यदि इस इलाके में आये तो उनका धंधा और अधिक चमक सकता है ।राजेन्द्र ने बताया कि पुतले बनाने की प्रक्रिया दशहरे से लगभग ढाई माह पहले ही शुरू हो जाती है । सबसे पहले बांस काटकर उसकी खपच्चियों से ढांचे टुकड़ों में बनाए जाते हैं , जो सबसे कठिन काम है । पुतलों की स्वाभाविकता इन्हीं ढांचों पर टिकी होती है । बाद में ढांचे पर कपड़ा व रद्दी कागज चिपकाया जाता है । रद्दी कागज पर एक बार फिर सफेद कागज चिपकाया जाता है । फिर उसे विभिन्न रंगों से सजाकर व चित्रकारी करके मूर्तरूप देते हैं । दशहरे के दिन दहन से पूर्व ग्राहकों की इच्छा के अनुसार उसमें आतिशबाजी डाली जाती है ।
उल्लेखनीय है कि यह धंधा साल में सिर्फ तीन माह ही चलता है ।शेष महीनों में ये लोग दूसरे धंधों में लग जाते हैं । एक दुकानदार नाथूराम नौकरी पेशा हैं किंतु पुश्तैनी धंधे को जीवित रखने की खातिर वे तीन महीने की छुट्टी ले लेते हैं और उसे चलाते रहना अपना फर्ज मानते हैं ।
बहरहाल इस समय तातारपुर क्षेत्र में पुतले बनाने में जुटे दर्जनों कारीगर रात दिन की मेहनत करके रावण , मेघनाद व कुंभकर्ण के पुतलों को अंतिम रूप देकर सजीव बनाने में लगे हैं ।
आपको भी अगर अपने इलाके में बच्चों के साथ मिलकर रावण दहन करने का शौक है तो जल्दी कीजिए और अपनी पसंद व जेब का ख्याल रखते हुए रावण का पुतला ले आइए कहीं ऎसा न हो कि सभी पुतले बिक जाएं । तो जाइए अन्यथा ”देर ना हो जाए कहीं देर ना हो जाए.........
दिल्ली के राजागार्डन के पास स्थित तातारपुर बस्ती रावण के पुतलों की मंडी के नाम से मशहूर है । दिन - प्रतिदिन बढ़ती रामलीलाओं की संख्याओं के चलते पिछले पचास वर्षों से चला आ रहा यह व्यवसाय आज खूब फल - फूल रहा है । कभी एक व्यक्ति द्वारा शुरू किए गए इस व्यवसाय मे दर्जनों लोग लग गए हैं यही वजह है कि इस क्षेत्र ने मंडी का रूप ले लिया है ।
तातारपुर मंडी दिल्ली में ही नहीं बल्कि देशभर में ऎकमात्र ऎसी मंडी है जहां हर साल सैकड़ों की संख्या में रावण के पुतले तैयार होते हैं । ये पुतले दिल्ली व देश के विभिन्न राज्यों तथा क्षेत्रों के अलावा विदेशी धरती पर भी अपनी धूम मचाते हैं । यहां रावण के अलावा मेघनाद तथा कुंभकर्ण के भी पुतले बड़ी मात्रा में तैयार किए जाते हैं । इस क्षेत्र में नजर डालने पर ऎसा लगता है मानो हां रावण परिवार का मेला लगा हुआ हो । पुतले बनाने में मशगूल एक दुकानदार महेन्द्रपाल ने बताया कि वे दस फुट से लेकर चालीस - पचास फुट तक के पुतले तैयार करते हैं ।आमतौर पर वे दस से बीस फीट तक के पुतले तैयार करते हैं जबकि तीस से पचास फीट के पुतले आर्डर पर ही तैयार करते हैं । क्योंकि इनमें लागत ज्यादा आती है तथा इनके गिरने का खतरा भी बना रहता है । राजेन्द्र बताते हैं कि पुतले बनाने का काम काफी जोखिम भरा भी है , क्योंकि यह जरूरी नहीं कि हमने जितने पुतले तैयार किए हैं वे सभी बिक जाएं । कभी - कभी तो सारे निकल जाते हैं और ग्राहकों कि डिमांड पूरी नहीं हो पाती है । कभी जो तैयार हैं वे भी नहीं निकल पाते । जिसका हर्जाना पुतला बनाने वाले को ही भुगतना पड़ता है । ये चीज ऎसी नहीं है कि नहीं बिक सकी है तो बाद में काम आ जाएगी । दशहरे के बाद इन पुतलों को पूछने वाला कोई नहीं होता । इसलिए वे बहुत ही डर - डर के पुतले तैयार करते हैं ।
राजेन्द्र ने बताया कि इस बार तो स्थिति काफी विकट थी क्योंकि कॉमनवेल्थ गेम्स के कारण वे लोग यह तय नहीं कर पा रहे थे कि पुतले बनाए या नहीं और यदि बनाएं तो कितने ? लेकिन हालात अच्छे ही नजर आ रहे हैं । उन्हें उम्मीद है कि संभवत: विदेशी मेहमान यदि इस इलाके में आये तो उनका धंधा और अधिक चमक सकता है ।राजेन्द्र ने बताया कि पुतले बनाने की प्रक्रिया दशहरे से लगभग ढाई माह पहले ही शुरू हो जाती है । सबसे पहले बांस काटकर उसकी खपच्चियों से ढांचे टुकड़ों में बनाए जाते हैं , जो सबसे कठिन काम है । पुतलों की स्वाभाविकता इन्हीं ढांचों पर टिकी होती है । बाद में ढांचे पर कपड़ा व रद्दी कागज चिपकाया जाता है । रद्दी कागज पर एक बार फिर सफेद कागज चिपकाया जाता है । फिर उसे विभिन्न रंगों से सजाकर व चित्रकारी करके मूर्तरूप देते हैं । दशहरे के दिन दहन से पूर्व ग्राहकों की इच्छा के अनुसार उसमें आतिशबाजी डाली जाती है ।
उल्लेखनीय है कि यह धंधा साल में सिर्फ तीन माह ही चलता है ।शेष महीनों में ये लोग दूसरे धंधों में लग जाते हैं । एक दुकानदार नाथूराम नौकरी पेशा हैं किंतु पुश्तैनी धंधे को जीवित रखने की खातिर वे तीन महीने की छुट्टी ले लेते हैं और उसे चलाते रहना अपना फर्ज मानते हैं ।
बहरहाल इस समय तातारपुर क्षेत्र में पुतले बनाने में जुटे दर्जनों कारीगर रात दिन की मेहनत करके रावण , मेघनाद व कुंभकर्ण के पुतलों को अंतिम रूप देकर सजीव बनाने में लगे हैं ।
आपको भी अगर अपने इलाके में बच्चों के साथ मिलकर रावण दहन करने का शौक है तो जल्दी कीजिए और अपनी पसंद व जेब का ख्याल रखते हुए रावण का पुतला ले आइए कहीं ऎसा न हो कि सभी पुतले बिक जाएं । तो जाइए अन्यथा ”देर ना हो जाए कहीं देर ना हो जाए.........
Wednesday, September 22, 2010
बिना हीरोइन के बन रही है फिल्म ”पिंजरा”
पिछले दिनों नॉएडा के ब्रह्मा स्टूडियो में फ़िल्म ''पिंजरा'' का मुहूर्त शॉट हुआ, निर्देशक बिजेश जयराजन, निखिल और ज्योति डोंगरा के उपस्थिति में फ़िल्म का पहला सीन शूट हुआ. फ़िल्म के पहले ही सीन में फ़िल्म के नायक निखिल ने एक संवाद बोला, ''माँ मेरा एक्सीडेंट हो गया, बजरी पर मोटर साइकिल स्लिप हो गयी.''
मूलतः गाजियाबाद के निवासी निर्माता अतुल पाण्डेय की फ़िल्म ''पिंजरा'' की शूटिंग गाजियाबाद, नॉएडा, दिल्ली और धामपुर में २० सितम्बर से शुरू हुई. अतुल पाण्डेय की पहली फ़िल्म ''समर २००७'' समीक्षक वर्ग में बहुत पसंद की गयी थी और अभी तक ''समर २००७'' विभिन्न राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में प्रशंसा पा रही है. फ़िल्म ''समर २००७'' किसानों द्वारा आत्महत्या पर आधारित थी.''समर २००७'' फ़िल्म के लेखक थे, बिजेश जयराजन. और यही बिजेश जयराजन अतुल पाण्डेय की इस
फ़िल्म ''पिंजरा'' के लेखक व निर्देशक हैं. इस फ़िल्म में हीरो की भूमिका में हैं निखिल पाण्डेय. जिनकी यह पहली फ़िल्म है और अन्य महत्वपूर्ण किरदारों में हैं ज्योति डोगरा और संदीप कुलकर्णी. हीरो निखिल बेरी बैरी जॉन अकादमी के टॉपर हैं. ज्ञात रहे कि बैरी जॉन शाहरुख खान, मनोज बाजपेयी, फ्रीडा पिंटो जैसे स्टार के भी गुरु रह चुके है. अभिनय के आलावा निखिल फ़ुटबाल के भी दीवाने हैं वह अपने कालेज के सर्वश्रेष्ठ खिलाडियों में गिने जाते हैं. उन की पसंदीदा टीम चेलसी है, और पसंदीदा खिलाडी फ्रेंक लम्फार्ड हैं. फ़िल्म की ४० दिन की शूटिंग में से २२ दिन दिल्ली, नॉएडा, गाज़ियाबाद में व १८ दिन की शूटिंग धामपुर में होगी.
निर्देशक बिजेश जयराजन की माने तो उनके अनुसार फ़िल्म का सब्जेक्ट दिल को छू लेने वाला है साथ ही फ़िल्म की विशेषता है कि फ़िल्म में कोई हीरोइन नही है. और भारत में बिना किसी हीरोइन के फ़िल्म बनाना अपने आप में सबसे बड़ी उपलब्धि होगी, बिजेश के अनुसार फ़िल्म ''पिंजरा'' में हम गाजियाबाद , नॉएडा व दिल्ली की प्रतिभाओ को मौका भी दे रहे हैं.
लेबल:
फिल्म
Tuesday, September 21, 2010
''शीतल उड़ी मस्त गगन में''
१९ सितम्बर को स्पेन में भारतीय समय के मुताबिक शाम के 8 बजे शीतल ''बर्ड मैन'' सूट के साथ १३००० फीट की ऊचाई से विमान से कूदी और फिर वह ४००० फीट तक पंखों के साथ एक चिड़िया की तरह उड़ी और बाद में फिर उन्होंने पैराशूट खोल कर सामान्य लैंडिंग की.
इस तरह विंग सूट (बर्ड मैन) पहन कर एक पक्षी की तरह उड़ना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है किसी भी भारतीय महिला के लिए. आज से पहले किसी भी भारतीय ने ऐसी जम्प नही की. शीतल के लिए तो यह एक नया रिकॉर्ड है ही और भारत के लिए भी यह राष्ट्रीय रिकॉर्ड है.
शीतल से जब उनकी इस उपलब्धि के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि, ''बहुत ही अच्छा व अलग सा अहसास है यह मेरे लिए, कैसे एक पक्षी आसमान में उड़ता है अब मुझे इसका अहसास है, मुझे बहुत ही ख़ुशी है कि मै यह सब कर सकी.
हालाँकि मैंने पहले भी पैराशूट से १८ अप्रैल २००४ में २४०० फीट से ३७ डिग्री सेल्सियस में उत्तरी ध्रुव पर बिना प्रशिक्षण जम्प की थी. फिर उसके बाद १६ दिसंबर २००६ अंटार्कटिका महाद्वीप पर ३८ डिग्री सेल्सियस में ११६०० फीट से जम्प की थी. लेकिन खुले आकाश में पक्षी की तरह उड़ना एक अलग ही तरह की ख़ुशी है.''
इस भारतीय महिला को उनकी इस महान उपलब्धि के लिए बहुत - बहुत शुभकामनाएं । साथ ही जोखिम भरी चुनौती को हंसते - हंसते साहस के साथ पूरी करने वाले उनके जज्बे को हम सलाम ठोंकते हैं क्योंकि शीतल ने इस जोखिम भरी उड़ान के साथ आसमान में कलाबाजियां खाकर भारतीय महिलाओं का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है ।
Monday, September 20, 2010
कार मालिकों सर्विस सेन्टर में जाएं तब सावधान रहें.......
अगर आपकी कार खराब हो गई है और आप उसे लेकर सर्विस सेन्टर में जा रहे हैं तो विशेष सावधानी बरतें । क्योंकि ऎसा भी हो सकता है कि आपकी कार सही होने के बजाए और बीमार हो जाए । कहने का मतलब है कि उसके सही पुर्जे सर्विस सेन्टर पर निकाल लिए जाएं । जानी - मानी कार कम्पनी के अधिकृत शोरूम में ठीक होने के लिए आई गाडियों के महंगे पार्ट्स बदलने का मामला सामना आया है । कम्पनी के ग्राहक पुरुषोत्तम दास गर्ग ने जहांगीर पुरी स्थित एक सर्विस सेन्टर पर आरोप लगाया है कि यहां उनकी गाड़ी के सस्पेंशन , एक्सेल और टायर जैसे पार्ट्स निकालकर दूसरी गाड़ी में लगा दिए गए हैं । इस संबंध में पुरुषोत्तम दास ने पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई है ।
शिकायत के मुताबिक पुरुषोत्तम दास ने एक दुर्घटना के बाद अपनी पांच माह पुरानी क्रूज गाड़ी को मरम्मत के लिए इस सर्विस सेन्टर में पिछले माह अगस्त की 24 तारीख को दी थी । लेकिन सर्विस सेन्टर प्रबंधकों ने गाड़ी को ठीक करना तो दूर उसका एस्टीमेट बनाकर बीमा कंपनी को सूचित करना भी उचित नहीं समझा । सर्विस सेन्टर के बार - बार चक्कर काटने के बाद जब पुरुषोत्तम 18 सितंबर को वर्कशॉप में गए तो उन्हें यह देखकर धक्का लगा कि उनकी गाड़ी के ठीक पुर्जे [ जिनका दुर्घटना से कोई वास्ता नहीं था ] निकालकर दूसरी गाडी में लगा दिए गए हैं । अपनी नई गाड़ी की यह हालत देखकर गर्ग ने जब तहकीकात की तो पता चला कि इस सर्विस सेन्टर में गाडियों के पुर्जे बदलना आम बात है । इधर सर्विस सेन्टर के प्रबंधक इस मामले में कुछ भी कहने से बच रहे हैं ।
परुषोत्तम गर्ग का कहना है कि थाना महेन्द्र पार्क पुलिस कहने को तो जांच में लगी है , मगर हकीकत यह है कि वह उन पर समझौता करने का दवाब डाल रही है ।
शिकायत के मुताबिक पुरुषोत्तम दास ने एक दुर्घटना के बाद अपनी पांच माह पुरानी क्रूज गाड़ी को मरम्मत के लिए इस सर्विस सेन्टर में पिछले माह अगस्त की 24 तारीख को दी थी । लेकिन सर्विस सेन्टर प्रबंधकों ने गाड़ी को ठीक करना तो दूर उसका एस्टीमेट बनाकर बीमा कंपनी को सूचित करना भी उचित नहीं समझा । सर्विस सेन्टर के बार - बार चक्कर काटने के बाद जब पुरुषोत्तम 18 सितंबर को वर्कशॉप में गए तो उन्हें यह देखकर धक्का लगा कि उनकी गाड़ी के ठीक पुर्जे [ जिनका दुर्घटना से कोई वास्ता नहीं था ] निकालकर दूसरी गाडी में लगा दिए गए हैं । अपनी नई गाड़ी की यह हालत देखकर गर्ग ने जब तहकीकात की तो पता चला कि इस सर्विस सेन्टर में गाडियों के पुर्जे बदलना आम बात है । इधर सर्विस सेन्टर के प्रबंधक इस मामले में कुछ भी कहने से बच रहे हैं ।
परुषोत्तम गर्ग का कहना है कि थाना महेन्द्र पार्क पुलिस कहने को तो जांच में लगी है , मगर हकीकत यह है कि वह उन पर समझौता करने का दवाब डाल रही है ।
Friday, September 10, 2010
ईद मुबारक
सभी को ईद की मुबारकबाद ।यह सुंदर और विहंगम दृश्य , जो आप देख रहे हैं ,यह पवित्र शहर मक्का स्थित सबसे बड़ी मस्जिद का है । यहां २९ अगस्त को हजारों की संख्या में मुस्लिम लोग एकत्रित हुए और रमजान की नमाज अदा की ।
Wednesday, September 8, 2010
विश्व की सबसे छोटी हस्तलिखित ”पवित्र कुरान ”
विश्व की सबसे छोटी हस्तलिखित ”पवित्र कुरान ”आबेद रेबो को अपनी महान दादी से विरासत में मिली है । यह पवित्र कुरान का पूर्ण संस्करण है जो कि 2.4cm x 1.9cm साइज की है । इसमें कुल 604 पेज हैं जिन्हें सोने की स्याही से सजाया गया है । हसन आबेद के कहने के मुताबिक यह छोटी पवित्र कुरान उनके बेरूत स्थित घर में लिखी गई ।
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